बजट में ऐसा कुछ नहीं था जिसे असाधारण कहा जाए या खींच-तान कर असाधारण की श्रेणी में रखा जा सके. सिर्फ क़ाबिल-ए-गौर था वित्त मंत्री तरुण भानोत का आत्मविश्वास

मंथन न्यूज
केंद्र के बाद आज मध्य प्रदेश सरकार का पहला पूर्ण बजट आ ही गया.इस पर कुछ प्रतिक्रिया ज़ाहिर करने से सदन में आज वित्त मंत्री तरुण भानोत ने जो पढ़ा वही दोहरा देता हूं.वो इसीलिए भी क्यूंकि वही शेर पूरे बजट को परिभाषित कर देगा. तो शेर कुछ यूं था..” तेरे पास जो है,उसी की कद्र कर, यहां आसमां के पास भी खुद की ज़मीन नहीं है”
दरअसल इसी भाव के साथ सरकार ने बजट की झलकी अपने आर्थिक सर्वेक्षण में दी थी. यूं भी जब से वितीय शक्तियों का केंद्र और राज्य में विभाजन हुआ है यानी जी एस टी के बाद, सरकारों के पास वैसे भी ज्यादा कोई करारोपण का अधिकार होता नहीं है.लिहाज़ा महंगे,सस्ते की उम्मीद एमपी की जनता कर भी नहीं रही थी. बजट यूं भी आम लोगों को बहुत समझ नहीं आता. लेकिन उसका सरोकार ज़रूर उससे होता है.
जितनी चादर उतने पैर फैलाए
सियासत को समझने वालों को ज़रूर इसका इंतज़ार था कि हर पल विपक्ष के “अब गई,तब गई” का आरोप झेल रही कमलनाथ सरकार के पहले सम्पूर्ण बजट में होगा क्या. सरकार ने अपने उन्हीं वादों पर फोकस किया है जो उसके घोषणापत्र में थे. मसलन; किसान कर्ज माफ़ी, महिला सशक्तिकरण, स्वास्थ्य, मंदिर, गाय सब कुछ इस बजट में आए लेकिन उतने ही प्रावधानों के साथ जितनी सरकार की चादर है.
एमपी में किसान कर्जमाफी के लिए सरकार को लगभग चाहिए 54 हज़ार करोड़ रुपए लेकिन इस बजट में प्रावधान है सिर्फ 8 हज़ार करोड़ का.ज़ाहिर है. यदि सरकार कर्नाटक इफैक्ट के बाद भी 5 साल चली तो आने वाले बरसों में इसका बजट बढ़ाया जा सकता है. वैसे भी आसन्न कोई चुनाव नहीं है जिसमें किसानों की नाराज़गी का मुद्दा कांग्रेस के खिलाफ बन सके. बेशक नगरीय निकाय के चुनाव ज़रूर हैं लेकिन ये मान्यता है कि उसका वोटर किसान नहीं होता क्यूंकि किसान शहर/क़स्बे में निवास नहीं करता. यदि करता भी होगा तो बहुसंख्य वोटर नहीं होता और उन चुनावों में मुद्दे बहुत स्थानीय होते हैं.
राइट टू---
बहरहाल, 6 नए सिविल अस्पताल, 70 नए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 329 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और 308 उप स्वस्थ्य केंद्र खोलने की घोषणा ये झलकाती है कि सरकार का ध्यान बेहतर स्वास्थ्य सेवा देने में है. सरकार ने राईट टू वाटर, राईट टू हेल्थ जैसे कई अभियान शुरू ज़रूर किये हैं लेकिन जिस सूबे का एक बहुत बड़ा इलाक़ा, जहां सामान्य दिनों में भी एक दिन छोड़कर पेयजल पाता हो,वहां ये सुनने में बहुत अच्छा लग सकता है लेकिन अमल में कितना आएगा ये भविष्य बताएगा.
सरकार ने लोकल कनेक्ट करने का प्रयास अपने बजट प्रावधानों में किया है. जैसे चंदेरी एवं महेश्वर की साड़ियां, धार का बाघ प्रिंट, छतरपुर टीकमगढ़ के पीतल के उत्पाद, भोपाल के बटुए, रतलाम के सेव, मुरैना की गज़क, भिंड के पेडे,सागर की चिरौंजी बर्फी, मालवा के चूरमा लड्डू,बाटी इनकी देश विदेश में पहचान बनाने के लिए सरकार इनकी ब्राडिंग करेगी. ये भी जामें में कैसे आएगा इसको लेकर कोई बड़ा प्रस्ताव दिखा नहीं.
देसी चीजों की ब्रांडिंग
वैसे भी एमपी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार मिलना सालों से चुनौती रहा है. यहाँ भित्ति चित्र बनाने वाले, गौंड आदिवासियों की पेटिंग कभी एम् एफ हुसैन, मंजीत बाबा के स्तर की नहीं हो पाई. हैरत इसी बात की है कि जबकि देश के हर हिस्से में हर बड़े घर के ड्राइंग रूम में आपको मधुबनी पेंटिंग के साथ ये पेंटिंग भी दिखती हैं लेकिन इन्हें बाज़ार या बाज़ार के अनुरूप कीमत नहीं मिलती.खैर ये अलग विषय है लेकिन चूँकि सरकार ने स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग का जिक्र किया, लिहाज़ा यहाँ भी उनका जिक्र ज़रूरी था.
कुल मिलाकर बजट में ऐसा कुछ नहीं था जिसे असाधारण कहा जाए या खींच-तान कर असाधारण की श्रेणी में रखा जा सके. सिर्फ क़ाबिल-ए-गौर था वित्त मंत्री तरुण भानोत का आत्मविश्वास. उन्हीं के शेर से मैंने लिखने की शुरुआत की थी और ख़त्म भी उन्हीं के सदन में सुनाए शेर से करना चाहूंगा कि “ अपनी लम्बाई का गुरूर है रास्तों को लेकिन वो मेरे क़दमों के मिज़ाज नहीं जानता” हम उम्मीद ही कर सकते हैं कि उनके क़दमों के मिजाज़ मंज़िल पाने तक ऐसे ही उत्साही रहें,ऊर्जावान रहें और खुशगवार रहें.

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