पेट्रोल और डीजल की कीमतों में राहत का स‍िलस‍िला लगातार जारी है. गुरुवार को भी ईंधन के दाम नीचे आए हैं. आज दाम घटने के बाद पेट्रोल की कीमत जहां 8 महीने के निचले स्तर पर पहुंच गई है. वहीं, डीजल के दाम भी 3 महीने में सबसे कम हो  गए हैं.


पेट्रोल और डीजल की कीमतों में पिछले 40 दिनों से लगातार राहत मिल रही है. गुरुवार को भी इस राहत  के बूते पेट्रोल 33 पैसे और डीजल 36 पैसे सस्ता हुआ है.


राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल 74 रुपये के नीचे आ गया है. यहां गुरुवार को पेट्रोल 73.24 रुपये प्रति लीटर का मिल रहा है. मुंबई में यह 78.80 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर पहुंच गया है. कोलकाता में 75.24 रुपये और चेन्नई में 75.24 रुपये प्रति लीटर पर बना हुआ है.


डीजल की बात करें तो इसकी कीमतों में भी राहत है. दिल्ली में एक लीटर डीजल के लिए आपको 68.13 रुपये चुकाने पड़ रहे हैं. मुंबई में इसकी कीमत 71.33 और चेन्नई में यह 71.95 का प्रति लीटर का मिल रहा है.डीजल


कोलकाता में भी डीजल 69.98 रुपये का है. इस कटौती के साथ दिल्ली में डीजल तीन महीने में सबसे सस्ता हो गया है.


पिछले 6 हफ्तों की बात करें तो  पेट्रोल और डीजल क्रमश: 10 रुपये व 7 रुपये सस्ता हुआ है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में जारी नरमी की बदौलत घरेलू स्तर पर भी पेट्रोल और डीजल सस्ता हो रहा है.


केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों की सैलरी बढ़ाने की लगातार कोशिश में है। अब सरकार आने वाले विधानसभा चुनाव में कोई रिस्क नहीं लेना चाहती है। कई राज्यों में विधानसभा चुनावों का माहौल है। वहीं दूसरी ओर दिल्ली सरकार ने कर्मचारियों की सबसे बड़ी मांगों में से एक पर सहमति जता दी है। कर्मचारी राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली पर आधारित नई पेंशन योजना (NPS) को पुरानी पेंशन योजना (OPS) से बदलने की मांग कर रहे थे। अब दिल्ली सरकार ने सरकारी कर्मचारियों को तोहफा देते हुए दिल्ली विधानसभा में नई पेंशन योजना को पुरानी पेंशन योजना से बदलने के प्रस्ताव पर मुहर लगा दी है।  दिल्ली विधानसभा में पारित प्रस्ताव के अनुसार 26 नवंबर 2018 को भारत सरकार से आग्रह किया गया कि मोदी सरकार तत्काल प्रभाव से नई पेंशन स्कीम को खत्म करके दिल्ली एनसीआर में काम कर रहे सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए एक बार फिर से सभी सुविधाओं के साथ पुरानी पेंशन स्कीम लागू करें

पुरानी पेंशन योजना के विपरीत नई पेंशन स्कीम कर्मचारियों को निवेश पर गारंटिड रिटर्न या न्यूनतम पेंशन की कोई गारंटी नहीं देता है। एनपीएस पारिवारिक पेंशन या सामाजिक सुरक्षा प्रदान नहीं करता है। नई पेंशन स्कीम जरूरत पड़ने पर लोन सुविधा प्रदान नहीं करता है। नई पेंशन स्कीम वार्षिक वृद्धि और डीए पर वृद्धि प्रदान नहीं करता है। एनपीएस कर्मचारियों को मेडिकल इमरजेंसी को पूरा करने के लिए अपने पेंशन फंड से पर्याप्त धन वापस लेने की अनुमति नहीं देता है।
एनपीएस कर्मचारियों को शेयर बाजारों और उन ताकतों की दया पर छोड़ देता है जो बाजार में छेड़छाड़ कर रहे हैं। एनपीएस पेंशन फंड से निकासी पर ड्रैकोनियन प्रतिबंध लगाता है। एनपीएस बीमा कंपनियों को सेवानिवृत्ति के बाद भी कम से कम दस साल तक वार्षिकी खरीदने के लिए मजबूर करने के साथ कर्मचारियों का शोषण करने की अनुमति देता है, और संविधान में निहित कल्याणकारी राज्य की भावना के विपरीत चलता है।

भोपाल, - प्रदेश में रिकॉर्ड मतदान (74.85 फीसदी) ने ब्यूरोक्रेसी को भी गफलत में डाल दिया है। ट्रेंड को समझने में माहिर अफसरों के मतदान के बाद हाव-भाव से ही पता चल जाता था, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। राजनीतिक पंडित अपने-अपने दावे कर रहे हैं, लेकिन अफसर मौन हैं। जबकि कर्मचारी कह रहे हैं कि 'वक्त है बदलाव का"।

मंत्रालय सहित राजधानी के तमाम सरकारी भवनों में बैठे वरिष्ठ अफसर चुनावी गणित को सुलझाने में लगे हैं। वे तय नहीं कर पा रहे हैं कि प्रदेश में रिकॉर्ड मतदान सरकार की योजनाओं का नतीजा है या जनता की नाराजगी का। कहा जाता है कि अफसर मतदान के बाद आकलन कर पैंतरे बदल लेते हैं। वे परिणाम आने का इंतजार किए बगैर जमावट में जुट जाते हैं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं है। अफसरों को भी समझ नहीं आ रहा है कि किसे साधें और किसे छोड़ें।

उधर, अपनी मांगों और अपने प्रति सरकार के व्यवहार से नाराज कर्मचारी साफ कह रहे हैं कि वक्त बदल रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि प्रदेश में रिकॉर्ड मतदान का कारण आक्रोश है और यह आक्रोश भाजपा के खिलाफ है। वे कहते हैं कि प्रदेश में 12 फीसदी कर्मचारी मतदाता हैं, जिनमें से 70 फीसदी ने विरोध दर्ज कराया है। कर्मचारियों का यह भी दावा है कि परिणाम पर किसान और व्यापारी वर्ग की नाराजगी भी दिखाई देगी। उनके लिए योजनाएं बनीं, लेकिन फायदा बिचौलिए उठा ले गए



भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के मतदान के बाद कांग्रेस ने चुनाव आयोग से ईवीएम की निगरानी के लिए अपने कार्यकर्ताओं की तैनाती के लिए अनुमति मांगी है। इसके साथ ही कमलनाथ ने इशारों इशारों में कलेक्टरों को चेतावनी भी दी है। उन्होंने कहा कि 'सबको ये याद रखना चाहिए कि 11 के बाद 12 तारीख भी आएगी।'

कमलनाथ का कहना है कि 'मैनें प्रदेश के कई अधिकारियों से बात की है और मुझे उन पर विश्वास है कि वो अपने काम और वर्दी की इज्जत रखेंगे। सबको याद रखना चाहिए कि 11 तारीख के बाद 12 तारीख भी आएगी। ईवीएम की निगरानी को लेकर मध्यप्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ का कहना है कि 'हमनें मांग की है, हम इंतजार कर रहे हैं जबाव का, एक जगह तो उन्होंने कहा है कि आज से नहीं कल से करें। पता नहीं, इसमें क्या भेद है। उन्होंने कहा कि 'हम इस पर निगरानी रखेंगे। 

मैनें बहुत सारे अधिकारियों से बात की है, मध्यप्रदेश के जो रिटर्निंग ऑफिसर है, जो अधिकारी है, मुझे उनपर विश्वास है, मुझे विश्वास है कि पुलिस के अधिकारियों पर कि वो अपनी वर्दी की इज्जत रखेंगे। सबको ये याद रखना चाहिए कि 11 के बाद 12 तारीख भी आएगी।

चुनाव प्रचार से अलग रहने पर दिग्विजय सिंह ने तोड़ी चुप्पी.

उन्होंने कहा कि पार्टी के हित में मैं अलग रहा.

मुझे चुनाव प्रचार से अलग रहने को कहा गया था.

भोपाल: मध्य प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके सीनियर कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह बड़े पैमाने पर इस बार कांग्रेस के चुनावी अभियान से अलग रहे. मध्य प्रदेश में वनवास खत्म करने और जीत की चाह रखने वाली कांग्रेस के चुनावी अभियान से व्यापक तौर पर दिग्विजय सिंह के अलग रहने की वजह अब तक साफ नहीं थी, मगर अब खुद उन्होंने इसका कारण बताया है. 

71 वर्षीय दिग्विजय सिंह ने कहा कि 'मैंने खुद को अभियान से बाहर रखा क्योंकि मुझे मध्यप्रदेश में ज्यादा हस्तक्षेप नहीं करने के लिए कहा गया था. इसलिए मैं दो अभियानों में बाहर रहा. जो कुछ भी मैं कर सकता था, जो भी मुझे करने के लिए कहा गया था, मैंने किया.'

जब दिग्विजय सिंह से पूछा गया कि आखिर 15 सालों से कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर क्यों है, तो इस पर उन्होंने 60 लाख फर्जी वोटर का हवाला दिया. उसके बाद उन्होंने कहा कि पांच सालों में एक विपक्षी पार्टी के तौर पर कांग्रेस कोई 'रीयल चुनौती' नहीं दे सकी. फिर जब सवाल पूछा गआ कि आखिर ऐसा क्यों? तो उन्होंने कहा कि लोग अपने क्षेत्र में ज्यादा व्यस्त थे. मगर उन्होंने जोर देकर कहा कि इस बार आपको मैं आश्वस्त कर सकता हूं कि इस बार कांग्रेस जिस तरह से एकजुट थी, ऐसा मैंने इससे पहले कभी नहीं देखा. उन्होंने आगे कहा कि बीजेपी के खिलाफ एक साथ मिलकर लड़ रहे हैं. 

बता दें कि पिछले महीने एक वीडियो में दिग्विजय सिंह यह कहते हुए सुने गए थे कि वह कोई चुनावी अभियान नहीं करेंगे या भाषण नहीं देंगे, जिससे उनकी पार्टी को नुकसान हो. पार्टी कार्यकर्ताओं से यह कहते हुए वह सुने गए थे कि ' मेरे पास एक काम है. कोई कैंपेनिंग नहीं, कोई भाषण नहीं. मेरे भाषण से कांग्रेस का वोट कटेगा, इसलिए मैं ऐसा नहीं करूंगा. 

दरअसल, दिग्विजय सिंह मध्य प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं. साल 2003 में कांग्रेस सत्ता से अलग हो गई थी और 230 सीटों के मुकाबले काग्रेस पार्टी 38 सीटों पर सिमट के रह गई थी. उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने या एक दशक तक राज्य की राजनीति में दखल न देने के लिए शपथ ली. हालांकि, 2013 में उनका यह प्रण पूरा हो गया. इसके बाद दिग्विजय सिंह कई तरह के विवादित बयानों को लेकर मीडिया में छाए रहे. ऐसे कई मौके आए जिनमें उनके बयान को लेकर कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ा.

विधानसभा चुनाव तक मतदाताओं के पीछे भागने वाले राजनीतिक दल अब मतगणना एजेंट बनाने के लिए अलग-अलग तरह की जोड़-तोड़ में जुटे हुए हैं। यह जोड़-तोड़ 11 दिसम्बर को होने वाली मतगणना के दौरान गणना कक्ष में अधिक संख्या में अपने समर्थकों को पहुंचाने के लिए हो रही है। इसकी वजह से निर्दलीय प्रत्याशियों की पूछपरख एक बार फिर बढ़ गई है।


कुछ प्रमुख राजनीतिक दलों के नेता स्ट्रांग रूम तक अपने ज्यादा से ज्यादा समर्थकों को पहुंचाने के लिए निर्दलीय प्रत्याशियों से सीधे संपर्क कर रहे हैं। इसके लिए निर्दलीय प्रत्याशियों को तरह-तरह के ऑफर देने की भी खबरें आ रही हैं।


निर्वाचन आयोग के नियमों के मुताबिक मतगणना के दिन स्ट्रांग रूम में प्रत्याशियों और उनके अधिकृत एजेंटों को ही प्रवेश दिया जाएगा। इसके लिए विशेष पास बनाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। ऐसे में कुछ प्रमुख दलों के प्रत्याशी निर्दलीयों से संपर्क कर उनके एजेंट की जगह अपने एजेंटों को मतगणना स्थल पर पहुंचाने के लिए सौदेबाजी कर रहे हैं। इसके लिए टेबल के हिसाब से कीमत तय हो रही है।




वहीं डाक मतपत्र की गणना के दौरान भी एजेंटों की सबसे अहम भूमिका होती है। राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों की रणनीति यह है कि वो मतगणना स्थल पर अपने ज्यादा से ज्यादा समर्थकों को रखें, ताकि विवाद की स्थिति में संख्या बल के दम पर दबाव बनाया जा सके।


वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को दी जिम्मेदारी


बताया जाता है कि राजनीतिक दल के उम्मीदवार सीधे तौर पर निर्दलीय प्रत्याशियों से संपर्क करने की जगह उनके पास अपने कार्यकर्ताओं को भेज रहे हैं, ताकि किसी प्रकार की वाद-विवाद की परिस्थितियां उत्पन्न होने पर वो सीधे तौर पर बच सके। कार्यकर्ता ही निर्दलीय प्रत्याशियों से संपर्क कर ऑफर दे रहे हैं।




 


हो सकता है कि कोई


निर्दलीय प्रत्याशी ऐसे समय में किसी पार्टी को समर्थन देता हो, लेकिन भाजपा को इसकी आवश्यकता नहीं पड़ती है।
संजय श्रीवास्तव, प्रवक्ता, भाजपा


कांग्रेस किसी भी निर्दलीय उम्मीदवार के अधिकार-पत्र में अपने एजेंट नहीं भेजती है। कांग्रेस उम्मीदवारों के अधिकार-पत्र से ही एजेंटों को भेजा जाएगा।
धनंजय सिंह ठाकुर, प्रवक्ता, कांग्रेस


भोपाल। मध्यप्रदेश में 28 नवंबर को वोटिंग के बाद अब विश्लेषण और कयासों का दौर शुरू हो गया है। हर मतदाता इसी उधेड़बुन में है कि मध्यप्रदेश में कोई बदलाव होगा या फिर से शिवराज सरकार सत्ता पर काबिज हो जाएगी।


मध्यप्रदेश का भाग्य ईवीएम में बंद हो गया है। 11 दिसंबर को सुबह भाग्य का पिटारा खुल जाएगा। सुबह 11 बजे तक स्पष्ट संकेत मिलने लग जाएंगे कि मतदाताओं ने किस को चुना है।


 


क्या पीएम मोदी की बराबरी करेंगे शिवराज
इस चुनाव के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या शिवराज सिंह चौहान चौथी बार मुख्यमंत्री बनकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बराबरी कर लेंगे या कांग्रेस फिर वनवास खत्म करके सत्ता में आ जाएगी। विश्लेषक कहते हैं कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह 2005 में मुख्यमंत्री बने थे। मध्यप्रदेश में तो शिवराज सिंह सबसे अधिक समय तक मुख्यमंत्री बने रहने वाले पहले व्यक्ति हो गए हैं। 
-जबकि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी गुजरात के चार बार मुख्यमंत्री रह चुके हैं।
-मोदी 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के 11वें मुख्यमंत्री बने थे।
-इसके बाद वे चार बार लगातार मुख्यमंत्री बने रहे।
-7 अक्टूबर 2001 से 22 मई 2014 तक मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने रहे।
-लंबे समय तक गुजरात का मुख्यमंत्री बने रहने का रिकार्ड भी मोदी के नाम पर है।
-यदि शिवराज सिंह चौहान फिर मुख्यमंत्री बन जाते हैं तो वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बराबरी कर लेंगे।


 


यह है शिवराज का कार्यकाल
-शिवराज सिंह 29 नवंबर 2005 को पहली बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे। इसके बाद 2008 में भी भाजपा की वापसी हुई और दोबारा मुख्यमंत्री चुने गए। 12 दिसंबर 2008 को शपथ ली थी।
-2013 में भी शिवराज के नेतृत्व में भाजपा ने तीसरी बार सरकार बनाई। शिवराज ने 13 दिसंबर 2013 को जीत हासिल को शपथ ली थी।


 


तो तीन चौथाई बहुमत मिला था
इधर, विधानसभा चुनाव 2018 में मत प्रतिशत और भी बढ़ गया है। इससे पहले चुनाव में भी शिवराज को जीत मिली थी, तब 7 फीसदी मत ज्यादा मिले थे। इस कारण भाजपा तीन चौथाई बहुमत के साथ सत्ता में आई थी। इस बार दो प्रतिशत और बढ़ गया है।



यह है 90 प्रतिशत का गेम
इधर, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ के बयान के बाद भाजपा ने बड़ा दांव खेला था। चुनाव वाले दिन जो विज्ञापन प्रकाशित हुआ उसमें 90 प्रतिशत मतदान की अपील की गई थी। यह जानबूझकर दिया गया था, जिससे कमलनाथ के उस बयान की याद दिलाई जा सके, जिसमें उन्होंने कहा था कि मुसलमान 90 प्रतिशत मतदान नहीं करेंगे तो कांग्रेस को भारी नुकसान होगा।


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