मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान   ने  शिक्षक भर्ती में लड़कियों को 50 फीसदी आरक्षण देने की घोषणा की है। उन्होंने कहा है कि यह शिक्षक भर्ती अगले महीने सितंबर में की जाएगी। 

शिवराज सिंह चौहान गुरुवार को जन आशीर्वाद यात्रा के दौरान टीकमगढ़ जिले में पहुंचे थे। यहां उन्होंने पृथ्वीपुर में 21 करोड़ से भी अधिक के निर्माण कार्यों का भूमि-पूजन किया और जनसभा को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने कहा कि संबल योजना प्रदेश में गरीबों की जिंदगी बदलने का अभियान है। 

राज्य सरकार ने गरीबों की जिंदगी को खुशहाल बनाने के लिए अपना खजाना खोल दिया है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है। सरकार जो कहती है, वह करती है। राज्य सरकार ने पूर्ववर्ती सरकारों की तरह गरीबी हटाने का सिर्फ नारा ही नहीं दिया है, बल्कि गरीबों के साथ न्याय किया है। 

उन्होंने विकास और जन-कल्याण की योजनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि पृथ्वीपुर क्षेत्र में 173 करोड़ रुपये लागत की समूह नल-जल योजना पूरी हो गई है। अब इस योजना से क्षेत्र के सभी 150 गांवों में नल के माध्यम से घर-घर पानी पहुंचाया जाएगा। कहा कि बान-सुजारा सिंचाई परियोजना से बुंदेलखंड के इस अंचल में हरियाली, खुशहाली और समृद्धि आएगी। 

सीएम ने केन-बेतवा परियोजना की चर्चा करते हुए बताया कि प्रदेश के हिस्से के पानी के बारे में उत्तर प्रदेश सरकार से बातचीत चल रही है। राज्य को अपने हिस्से का पानी मिलेगा, जिससे इस क्षेत्र की सिंचाई की तस्वीर ही बदल जाएगी। 

शिवराज ने कहा कि संबल योजना में गरीब परिवारों के प्रतिभावान बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए राज्य सरकार हर तरह की सुविधाएं और सहायता मुहैया करवा रही है। उन्होंने इन परिवारों का आह्वान किया कि बच्चों की उच्च शिक्षा के खर्चे की चिंता छोड़ उन्हें खूब पढ़ाएं, आगे बढ़ाएं, पूरी व्यवस्था राज्य सरकार करेगी। 



मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव नवंबर में होने की उम्मीद है। संभावना जताई जा रही है कि 26 से 30 नवंबर के बीच चुनाव होगा, जबकि इसके लिए आचार संहिता 4 से 6 अक्टूबर के बीच लग सकती है। मध्य प्रदेश के अलावा राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मिजोरम में भी विधानसभा चुनाव होने हैं। माना जा रहा है कि यहां भी मध्य प्रदेश के साथ ही चुनाव होंगे।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव के लिए नवंबर का समय बेहद अनुकूल है और राजनीतिक पार्टियां चाहती हैं कि दिवाली (7 नवंबर) और ईद (21 नवंबर) के बाद ही चुनाव हों, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग मतदान में भाग ले सकें। 

माना जा रहा है कि मध्य प्रदेश में एक चरण में और छत्तीसगढ़ में दो चरणों में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। पिछली बार 2013 में मध्य प्रदेश में 4 अक्टूबर को चुनावी कार्यक्रम जारी हुआ था, जबकि अधिसूचना एक नवंबर और मतदान 25 नवंबर को हुए थे। सूत्रों की मानें तो इस बार भी पिछली बार की तिथियों के आसपास ही चुनावी कार्यक्रम जारी हो सकते हैं। 

सूत्रों के मुताबिक, अक्टूबर के अंतिम हफ्ते में चुनाव की अधिसूचना जारी कर दी जाएगी, जिसके बाद नामांकन भरने का काम भी शुरू हो जाएगा। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 17 सितंबर से राज्य में चुनावी शंखनाद करेंगे, जबकि भाजपा का शंखनाद 25 सितंबर को होगा। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 25 सितंबर को जंबूरी मैदान में हो रहे कार्यकर्ता महाकुंभ से अपने चुनावी अभियान का आगाज करेंगे।   

सूत्रों की मानें तो राजनीतिक दल चुनाव प्रचार के लिए चुनाव आयोग से अधिक समय की मांग कर रहे हैं। दरअसल, अभी तक नाम वापसी से लेकर मतदान तक प्रचार के लिए उम्मीदवारों को 15 दिन का समय मिलता है, लेकिन अब इसे 20 दिन करने की मांग हो रही है। हालांकि इस पर चुनाव आयोग की ओर से अभी तक कोई बयान नहीं आया है।

22 सीटों पर 25 साल से नहीं मिली कांग्रेस को जीत, भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने की तैयारी में कमलनाथ - कमलनाथ ने बनाई चुनाव जीतने की रणनीति


भोपाल : प्रदेश का विधानसभा चुनाव जीतने के लिए पीसीसी अध्यक्ष कमलनाथ ने नया फॉर्मूला निकाला है। कमलनाथ प्रदेश की उन हारी हुई विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार घोषित करने वाले हैं जो कांग्रेस की राह में मुश्किलें बढ़ाती हैं।


इनमें से ज्यादातर सीटें मध्यभारत, महाकौशल और मालवा-निमाड़ की हैं । इनमें 22 सीटें वो हैं जो कांग्रेस 25 साल से नहीं जीती है। कांग्रेस का दावा ये भी है कि भाजपा की अपराजेय 22 सीटों में से अधिकांश सीटें इस बार कांग्रेस के पास आ जाएंगी। इन सीटों पर कांग्रेस ने विशेष रणनीति के तहत काम किया है। इन सीटों पर दस साल कांग्रेस के शासनकाल में भी भाजपा के विधायक थे।

ये 22 सीटें प्रदेश के 15 जिलों से आती हैं। कमलनाथ इस बात का संकेत दे चुके हैं कि अगले 17 सितंबर तक हारी हुई 80 सीटों के उम्मीदवारों के नाम सामने आ जाएंगे।

25 साल से हाथ नहीं आईं ये सीटें -

- खंडवा जिले की खंडवा और हरसूद - - भोपाल जिले की गोविंदपुरा - - इंदौर जिले की इंदौर - 2 और इंदौर - 4 - - भिंड जिले की मेहगांव - - मुरैना जिले की अंबा - - शिवपुरी जिले की शिवपुरी और पोहरी - - सागर जिले की सागर और रेहली - - सतना जिले की रामपुर बघेलान और रैगांव - - रीवा जिले की देवतालाब और त्यौंथर - - सीहोर जिले की सीहोर और आष्टा - - अशोकनगर जिले की अशोकनगर -- छतरपुर जिले की महाराजपुर - - सिवनी जिले की बरघाट - - जबलपुर जिले की जबलपुर कैंट - - होशंगाबाद जिले की सोहागपुर

ये है जीत की रणनीति

कांग्रेस ने इन सीटों पर जीत के लिए खास प्लान तैयार किया है। 17 सितंबर को राहुल गांधी भोपाल आने वाले हैं जहां पर वो बैठकें लेंगे और विदिशा में आम सभा भी करेंगे। कांग्रेस की कोशिश 17 सितंबर के पहले हारी हुई सीटों के उम्मीदवार घोषित करने की है।

राहुल गांधी जब दूसरे दौर में प्रदेश में यात्रा निकालने आएंगे तब कांग्रेस उनकी यात्रा को हारी हुई सीटों तक ले जाने वाली है। 25 साल से कांग्रेस की पहुंच से दूर रही विधानसभा सीटों पर दस-दस कार्यकर्ताओं की ऐसी टीम बना कर तैनात कर रही है जो चुनाव तक उन सीटों पर ही काम करेंगे, उनकी सीधी रिपोर्टिंग कमलनाथ को रहेगी। इसके अलावा टिकट को लेकर समन्वय की जिम्मेदारी दिग्विजय सिंह को सौंपी गई है, दिग्विजय जिला स्तर पर भी समन्वय समिति बनाने जा रहे हैं।

गठबंधन के लिए अंतिम बैठक आज

मध्यप्रदेश में बसपा के साथ गठबंधन को लेकर गुरुवार को दिल्ली में अहम बैठक होने जा रही है। ऐसा माना जा रहा है कि गठबंधन की बात को लेकर ये अंतिम बैठक है और इस बैठक में मप्र,छग और राजस्थान में गठबंधन और बसपा को दी जाने वाली सीटों पर फैसला कर लिया जाएगा। कांग्रेस को उम्मीद है कि बसपा से गठबंधन हारी हुई सीटें जीतने में मददगार साबित होगा।

सोशल मीडिया को और एक्टिव करेगी कांग्रेस

चुनाव के दौरान सोशल मीडिया की सक्रियता से कमलनाथ खुश नहीं हैं। कमलनाथ ने सोशल मीडिया टीम को तलब कर ये साफ कर दिया है कि उसे प्रभावी काम करना पड़ेगा और जल्द से जल्द सारी नियुक्तियां कर सोशल मीडिया का काम नजर आना चाहिए। कमलनाथ ने फेसबुक पर कमजोर प्रदर्शन को लेकर भी नाराजगी जताई,ट्विटर पर काम को उन्होंने ठीक बताया।

हमारी प्राथमिकता हारी सीटों पर पहले उम्मीदवार घोषित करने की है, राहुल गांधी के दौरे के पहले संभवत: हम 80 सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर देंगे,गठबंधन का जहां तक सवाल है तो हम सबको साथ लेकर चल रहे हैं। - कमलनाथ प्रदेश अध्यक्ष,कांग्रेस -

14 जुलाई से उनकी यह यात्रा शुरू हो चुकी है और शिवराज सुबह 10 बजे भोपाल से सीएम हाउस से निकलकर स्टेट हैंगर पर पहुंच रहे हैं. पहले स्टेट प्लेन, फिर हेलिकॉप्टर और फिर बसनुमा रथ में सवार होकर रोड शो करते हुए जनता में पहुंच रहे हैं.

एक राजनीतिक विश्लेषक दिलचस्प टिप्पणी करते हैं कि 'अगर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान को महसूस हो जाए कि वे युवाओं के वोट हासिल करने में कमजोर साबित हो रहे हैं तो वे ऐसी स्कीम भी ला सकते हैं कि शादी कीजिए हनीमून सरकार करवाएगी.' प्रसूति से लेकर अंत्येष्ठी तक सैकड़ों वेलफेयर स्कीम चलाने वाले शिवराजसिंह चौहान का मध्यप्रदेश में आज की तारीख में कोई मुकाबला नहीं है. तो इसकी एक खास वजह है- शिवराज का पॉलिटिकल मॉडल. वे न सिर्फ स्कीम मास्टर हैं, बल्कि कोई भी समस्या खड़ी हो वे तत्काल उसकी भरपाई के लिए एक स्कीम खड़ी कर देते हैं. जिसका फल यह है कि इन 15 सालोंं में उन्होंने अपने वोटर नहीं बल्कि बेनिफिशरिस (लाभार्थी) खड़े कर दिए हैं.पहली बार जितनी ताकत झोंक रहे हैं
अब चौथी बार शिवराज सिंह जनता से वोट मांगने जन आशीर्वाद यात्रा पर निकल पड़े हैं. एक लो फ्लोर बस को रथ बनाकर मध्यप्रदेश के ग्रामीण ट्राइबल इलाकों को टारगेट कर रहे हैं. वे जानते हैं कि भाजपा यहीं कमजोर हो सकती है. कांग्रेस की नजर इन्हीं सीटों पर है. आदिवासी, किसान और ग्रामीण इलाका कांग्रेस की वापसी का रास्ता बन सकता है. वे तीन बार के मुख्यमंत्री हैं लेकिन अपने इस अभियान में इतनी ताकत झोंक रहे हैं जैसे पहली बार कोई नेता वोट मांगने के लिए जनता के बीच हो.रोजना 14 से 16 घंटे सड़क पर
14 जुलाई से उनकी यह यात्रा शुरू हो चुकी है और शिवराज सुबह 10 बजे भोपाल से सीएम हाउस से निकलकर स्टेट हैंगर पर पहुंच रहे हैं. पहले स्टेट प्लेन, फिर हेलिकॉप्टर और फिर बसनुमा रथ में सवार होकर रोड शो करते हुए जनता में पहुंच रहे हैं. रोजाना लगभग दो सौ से ढाई सौ किमी  का यह बस रूट तय करने में उन्हें 14 घंटे तक लग रहे हैं, लेकिन उत्साह की कोई कमी या थकान का कोई नामोनिशान उनके आसपास नहीं है. उन्हें अपने रथ से 10 हजार किमी. का फासला तय करना है.गरीब का दर्द जानता हूं
 रथयात्रा  पर हुई विशेष बातचीत में वे उत्साह के साथ कहते हैं कि यह परिश्रम उनसे ईश्वर ही करवा रहा है. खुद को जनता का सेवक और जनता का मामा बताते हुए वे कहते हैं, 'उन्होंने गरीबी को करीब से देखा है. इसलिए वे जनता की तकलीफ को जानकर योजना तैयार करते हैं. मजदूर बहनों को प्रसूति लाभ उन्होंने इसलिए शुरू किया ताकि वे दो दिन बाद ही काम पर लौटने की जल्दी न करें.' देश भर के किसानों के लिए मॉडल बनीं भावांतर योजना को लेकर वे कहते हैं, 'उन्हें पता था कि बाजार में उसके साथ मुनाफाखोर क्या कर रहे हैं. हमने धान के अंतर का पैसा सीधे किसान के खाते में जमा करवाया है.'जनता के आगे कोई नफा नुकसान नहीं
 बिजली माफी की योजना को जनता के लिए सबसे बड़ी राहत बताते हुए वे कहते हैं कि मेरे प्रदेश वासी बिजली के बिलों से तकलीफ में थे. हमने तय किया और जरूरत की बिजली का अनुमान लगाकर दो सौ रुपये बिल हर गरीब परिवार के लिए कर दिया. क्या यह चुनावी मास्टर स्ट्रोक है? वे कहते हैं ऐसा राजनीतिक लोग कहते होंगे लेकिन मेरे लिए तो जनता की परेशानी है और मैं इसमे न तो राजनीतिक नफा देखता हूं न खजाने का नुकसान.टेक्नॉलॉजी से बदले चुनाव का नजारा
रथ यात्रा अलीराजपुर से जोबट और वहां से थांदला की ओर जा रही है. पूरा आदिवासी इलाका है. लेकिन सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए काम ने इस इलाके को जैसे छोटे शहरों में तब्दील कर दिया है. डिजिटल टेक्नॉलॉजी इस चुनाव में क्या असर दिखाएगी इसका नजारा भी यहां देखने को मिल रहा है.इस बार पोस्टर में पीएम मोदी भी 
 शिवराज मामा का रोड शो देखने सुनने आई भीड़ के आदिवासी युवा, मोबाइल से वीडियो बना रहे हैं. मोटर साइकिल पर रथ के पीछे दौड़ रहे हैं. पूरा इलाका भाजपा और शिवराजमय है और इस बार सबसे खास बात यानि शिवराज के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हैं. 2013 के चुनाव में शिवराज अकेले भाजपा के नायक थे. लेकिन अब जगह-जगह पोस्टर बैनर होर्डिंग्स में पीएम मोदी भी शिवराज के साथ नजर आ रहे हैं.रोजना दो करोड़ खर्च
कांग्रेस का आरोप है कि शिवराज सरकार इस यात्रा पर रोज दो करोड़ खर्च कर रही है और प्रायोजित भीड़ इकट्‌ठी कर सरकारी खजाने को चूना लगी रही है. लेकिन शिवराज का रथ निर्बाध अपनी गति से चल रहा है. कांग्रेस अभी चुनाव का फ्लोर मैनेजमेंट करने में जुटी है. उसकी बरसों से बंद गाड़ी को चलाने लायक बनाया जा रहा है. वहीं शिवराज ने किसी का भी इंतजार किए बगैर अपनी चालू गाड़ी को मैदान में लाकर दौड़ाना शुरू कर दिया है.वे जानते हैं कि सहजता ही उनकी ताकत है और इस बार उनका मुकाबला कांग्रेस से ज्यादा अपनी पार्टी वर्कर से है. जो जनता से ज्यादा अपेक्षाओं से भरा हुआ है. उसकी नाराजगी चौथी बार सरकार बनाने के लिए भारी पड़ सकती है. इसलिए यह जन आर्शीवाद यात्रा जनता के लिए कम पार्टी वर्कर के लिए ज्यादा है. जो सड़कों पर माहौल बनाने सक्रिय होने निकल पड़ा है.रहा सवाल यात्रा की सभाओं में उमड़ रही ठेठ गांव से आ रही आदिवासी भीड़ का तो उनकी आंखों की चमक और चेहरे की मासूमियत बयां करती है कि उन्हें पता है कि हर चुनाव का यहीं दस्तूर है. शिवराज मंच से क्या घोषणाएं कर रहे हैं क्या कह रहे हैं? यह उन्हें खास समझ नहीं आ रहा लेकिन उन्हें पता है कि
'चुनाव आवि गया है...' और अब तो 'ऐसो ही कई बार आनो पड़ेगो...''तो वोट किसे देगा.. शिवराज मामा को ? हां जो को म्हारा ठाकर बोल दे...'


आयोग ने रिपोर्ट में कहा है कि, यदि एक साथ चुनाव कराना कुछ कारणों से संभव नहीं होता है तो एक कैलेंडर वर्ष में होने वाले सभी चुनाव एक साथ आयोजित किए जा सकते हैं



प्रतीकात्मक तस्वीर


देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने को लेकर विधि आयोग ने सरकार को अपनी मसौदा रिपोर्ट में एक साथ कराने के प्रस्ताव का समर्थन करते हुए संविधान में संशोधन करने की सलाह दी है.


हालांकि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में  कहा है कि आधे राज्यों में एक साथ चुनाव कराने लिए संवैधानिक संशोधन जरूरी नहीं है. 12 राज्यों और एक केंद्र शाषित प्रदेश का चुनाव 2019 के आम चुनावों के साथ किए जा सकते हैं. वहीं 2021 के अंत तक 16 राज्यों और पुडुचेरी के चुनाव आयोजित किए जा सकते हैं. जिसके परिणाम स्वरूप भविष्य में पांच साल की अवधि में केवल दो बार  चुनाव होगा.

इस मसौदा रिपोर्ट में विधि आयोग ने कहा है कि आयोग इस तथ्य से अवगत है कि संविधान के मौजूदा प्रावधानों में एक साथ चुनाव कराना संभव नहीं है. लिहाजा आयोग की सलाह है कि, सरकार इसके लिए निश्चित संवैधानिक संशोधन करे.

इस रिपोर्ट में आयोग ने लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने का समर्थन करते हुए यह सुनिश्चित किया है कि संविधान और अन्य कानून में कम से कम संशोधन करना पड़े.

गौरतलब है कि केंद्र की मोदी सरकार देश में एक साथ चुनाव कराने के विचार का समर्थन कर रही है. जिसके पीछे तर्क है कि इससे देश के नागरिकों पर चुनावी खर्चों का अतिरिक्त भार कम होगा और बार-बार चुनाव कराने के लिए संसाधनों के इस्तेमाल की बचत होगी.

अब विधि आयोग ने सरकार के समक्ष एक देश, एक चुनाव पर विभिन्न सिफारिशों के साथ रिपोर्ट सौंपी है. हालांकि सरकार इन सिफारिशों को मानने के लिए बाध्य नहीं है.

इससे पहले चुनाव आयोग चुनाव आयोग एक साथ चुनाव कराने को लेकर अपनी राय स्पष्ट कर चुका है. चुनाव आयोग का मानना है कि मौजूदा संवैधानिक प्रावधानों में यह संभव नहीं है, लिहाजा सरकार को पहले संवैधानिक प्रावधानों पर ध्यान देना चाहिए.  

बता दें कि देश में एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव की वकालत करते हुए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने विधि आयोग को पत्र भी लिखा था. जिसमें अमित शाह ने कहा था कि इससे चुनाव में बेतहाशा खर्च पर लगाम लगागी और देश के संघीय स्वरूप को मजबूत बनाने में मदद मिलेगी.



 मंथन न्युज, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति (एससी एसटी) वर्ग को राज्य की नौकरियों में आरक्षण का लाभ देने के मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा है कि अपने राज्य में एससी एसटी सूची में शामिल व्यक्ति दूसरे राज्य की सरकारी नौकरी में एससी एसटी के आरक्षण का लाभ नहीं प्राप्त कर सकता।

पांच न्यायाधीशों की पीठ ने सुनाया फैसला
हालांकि कोर्ट ने दिल्ली के बारे में व्यवस्था देते हुए कहा है कि दिल्ली की नौकरियों में आरक्षण के केन्द्रीय प्रावधान लागू होंगे। ये फैसला जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने चार एक के बहुमत से सुनाया है। पीठ के बाकी न्यायाधीश जस्टिस एन रमना, जस्टिस आर भानुमति, जस्टिस एम शांतनगौडर और जटिस्स एस अब्दुल नजीर थे।

आरक्षण का संवैधानिक लाभ उस राज्य की सीमा तक ही सीमित
कोर्ट के सामने सवाल था कि क्या एक राज्य में एससी एसटी वर्ग में आने वाला व्यक्ति दूसरे राज्य की नौकरी मे एससी एसटी आरक्षण के लाभ का दावा कर सकता है। कोर्ट ने बहुमत से दिये फैसले में कहा है कि ऐसा नहीं हो सकता। एक व्यक्ति जो एक राज्य में अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति वर्ग में दर्ज है उसे दूसरे राज्य मे जाने पर अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं मिल सकता। अनुच्छेद 341 और 342 में मिले हुए आरक्षण के संवैधानिक लाभ उस राज्य की सीमा तक ही सीमित हैं जिस राज्य की सूची में वह जाति शामिल है।

राज्य को तय प्रक्रिया का पालन करना होगा
एक राज्य का एससी एसटी निवासी दूसरे राज्य में उस वर्ग का होने का दावा नहीं कर सकता।कोर्ट ने कहा कि राष्ट्रपति अनुच्छेद 341 और 342 के तहत अनुसूचित जाति और अनूसूचित जनजाति की सूची किसी राज्य के बारे में जारी करते हैें। वह सूची किसी विशेष राज्य की भौगोलिक स्थिति देखते हुए उसी के बारे में जारी होती है। राज्य उसमें कोई भी बदलाव नहीं कर सकता न ही स्वयं से उसका दायरा बढ़ा सकता है। अगर राज्य किसी वर्ग को उसमें लाभ देना चाहता है तो उसे उसके लिए तय प्रक्रिया का पालन करना होगा।

...तो अव्यवस्था कायम हो जाएगी
राज्य को अपना नजरिया केन्द्रीय अथारिटी को बताना होगा ताकि संसदीय प्रक्रिया के तहत उस राज्य की एससी एसटी सूची में संशोधन करके उसे जोड़ा जाए। राज्य अनुच्छेद 16(4) के तहत एकतरफा फैसला लेकर उसमें बदलाव नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसा होने लगेगा को तो अव्यवस्था कायम हो जाएगी। इसीलिए संविधान में इसकी इजाजत नहीं दी गई है। हालांकि न्यायमूर्ति आर भानुमति ने बहुमत की पीठ से असहमति जताई है और अलग से उसके कारण दिये हैं। कोर्ट ने अपने फैसले में इस बावत दिए गए पूर्व फैसलों पर विस्तृत चर्चा करते हुए संविधान पीठ को विचार के लिए भेजे गए सवाल का जवाब दिया है।


बीजेपी का दावा है कि अगले लोकसभा चुनाव में पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पार्टी पहले से अधिक बहुमत से सरकार बनाएगी.


नई दिल्ली:प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  की अध्यक्षता में बीते मंगलवार को बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों एवं उपमुख्यमंत्रियों की बैठक में पार्टी ने लोकसभा चुनाव 2019 के लिए अपनी तैयारियों एवं संगठनात्मक स्थिति पर चर्चा की थी. इस बैठक में पार्टी अध्यक्ष अमित शाह, केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, नितिन गडकरी आदि ने भी हिस्सा लिया था. बीजेपी ने जोर दिया कि अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव में सभी को साथ लेते हुए नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी पहले से अधिक बहुमत से सरकार बनाएगी. सत्ता में वापसी के लिए पार्टी की नजर पांच बड़े राज्यों की 208 सीटों पर है. ये राज्य हैं: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र. 2014 के चुनाव में इन पांच राज्यों की 208 सीटों में से बीजेपी ने 192 सीटें जीती थीं. इस तथ्य को ध्यान में रखकर ही चुनाव की रणनीति बनाई जा रही है. सवाल यह है क्या ये बीजेपी के लिए यह आसान होगा? आइये इन पांचों राज्यों के समीकरणों पर एक नजर डालते हैं: 

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की स्थिति
केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी ने यह भी दावा किया कि इस साल के अंत तक मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी जीत दर्ज करेगी. मध्य प्रदेश में लोकसभा की 29 सीटें हैं जबकि छ्त्तीसगढ़ में 11 सीटें हैं. 2014 के चुनाव की बात करें तो मध्य प्रदेश में बीजेपी को 29 में से 27 सीटें मिली थीं. कांग्रेस की ओर से ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ ही अपना गढ़ बचा पाए थे. इसी तरह से छत्तीसगढ़ में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 11 में से 10 सीटें जीती थीं. कांग्रेस को सिर्फ दुर्ग सीट पर जीत मिली थी. इन दोनों राज्यों में इस साल के अंत में चुनाव होने हैं. हाल में आए चुनावी सर्वों में इन दोनों राज्यों में बीजेपी की राह मुश्किल बताई गई है. वहीं, बीजेपी फिर से जीत का दावा कर रही है. अगर मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बीजेपी की वापसी नहीं हुई तो मिशन 2019 की राह बहुत मुश्किल हो जाएगी.


राजस्थान में बीजेपी की स्थिति
2014 के लोकसभा चुनाव में राजस्थान में बीजेपी ने क्लीन स्वीप करते हुए 25 की 25 सीटों पर परचम फहराया था. राजस्थान में भी 2018 के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं. वसुंधरा राजे गौरव यात्रा निकालकर सत्ता में फिर से वापसी के लिए पूरा जोर लगा रही हैं. राजस्थान विधानसभा चुनाव के कुछ प्रीपोल सर्वे सामने आए हैं जिसमें दावा किया गया है कि वसुंधरा सरकार सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है. ऐसे में अगर वसुंधरा सरकार सत्ता में वापस नहीं आई तो निश्चित रूप से इसका असर लोकसभा चुनाव 2019 में दिखेगा और हो सकता है कि बीजेपी इस बार क्लीन स्वीप न कर पाए. अगर परिणाम इसके उलट रहा तो बीजेपी राहत की सांस ले सकती है. 


महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश के हालात
2014 के चुनाव के समय महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार नहीं थी. इन दोनों राज्यों में चुनाव 2014 के बाद हुए. दोनों राज्यों में बीजेपी ने सरकार बनाई. इसमें उत्तर प्रदेश में पार्टी ने अभूतपूर्व प्रदर्शन किया था. हालांकि योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बदले राजनीतिक हालात में सपा-बसपा के गठबंधन के सामने बीजेपी गोरखपुर और फूलपुर का लोकसभा चुनाव हार गई. इतना ही नहीं पार्टी कैराना में जीत दर्ज करने में विफल रही. ऐसे में बीजेपी के लिए महागठबंधन बड़ी चुनौती बनकर उभरा है. उधर, महाराष्ट्र में शिवसेना और बीजेपी के बीच सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. शिवसेना पहले ही घोषणा कर चुकी है कि वह लोकसभा चुनाव बीजेपी के साथ मिलकर नहीं लड़ेगी. महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी मिलकर चुनाव लड़ने की बात कह रहे हैं. 

महाराष्ट्र में अगर शिवसेना, बीजेपी और एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन के बीच त्रिकोणीय मुकाबला हुआ तो बीजेपी को फायदा मिल सकता है. हालांकि पिछले कुछ उपचुनावों तीनों प्रमुख दलों ने एक दूसरे को मात देने के लिए बिल्कुल अलग रणनीति बनाई. कई मुकाबलों से ऐन वक्त पर शिवसेना ने दूरी बनाकर मुकाबले को रोचक बनाया था. अगर 2019 चुनाव में शिवसेना ने यही रणनीति अपनाई तो बीजेपी को नुकसान हो सकता है.

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