शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय शिवपुरी में आज कारगिल विजय दिवस मनाया गया! इस अवसर पर महाविद्यालय के प्रभारी प्राचार्य  प्रों. महेंद्र कुमार के साथ स्टाफ के अन्य सदस्य एवं अनेकों छात्र छात्राएं उपस्थित रहे! संदीप शर्मा ने बताया कि हमारी सेना ने पहाड़ी के नीचे होने के बावजूद विजय प्राप्त की ! कल्पित श्रीवास्तव ने बताया प्रतिवर्ष सेना के दिल्ली हेड क्वार्टर पर वीर शहीदों को याद किया जाता है! विक्की जैन ने बताया हमें शहीद दिवस को इस तरीके से याद रखना चाहिए जैसे हम अपने जन्मदिवस को याद रखते हैं! शिवानी राठौर ने बताया कि हमें सैनिकों को अपने परिवार के सदस्यों की तरह मानना चाहिए और हमारे अंदर उनके प्रति वही भावनाएं होना चाहिए जैसा कि हम अपने परिवार के सदस्यों के प्रति रखते हैं! उनके त्याग समर्पण हो हमें याद रखते हुए राष्ट्र सेवा करनी चाहिए!"अपनी आजादी को हम हरगिज मिटा सकते नहीं, सर कटा सकते हैं लेकिन सर झुका सकते हैं नहीं!"
कारगिल विजय दिवस के उपलक्ष में आयोजित कार्यक्रम में सभी छात्र-छात्राओं को संबोधित करते हुए डॉ. रामजी दास राठौर ने बताया कि कारगिल विजय दिवस स्वतंत्र भारत के लिये एक महत्वपूर्ण दिवस है। इसे हर साल 26 जुलाई को मनाया जाता है। कारगिल युद्ध लगभग 60 दिनों तक चला और 26 जुलाई को उसका अंत हुआ। इसमें भारत की विजय हुई। इस दिन कारगिल युद्ध में शहीद हुए जवानों के सम्मान हेतु यह दिवस मनाया जाता है।भारत और पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान के बीच हुए कारगिल युद्ध के 20 साल पूरे हो गए हैं। दोनों देशों के बीच लड़ी गई यह लड़ाई 3 मई से 26 जुलाई 1999 तक चली थी। कारगिल युद्ध को 'ऑपरेशन विजय' के नाम से भी जाना जाता है। कारगिल सेक्टर को मुक्त कराने के लिए यह नाम दिया गया था। 1999 के बाद से हर साल यह दिन भारत में कारगिल विजय दिवस के नाम से मनाया जाता है। इस युद्ध में हमारे लगभग 527 से अधिक वीर योद्धा शहीद व 1300 से ज्यादा घायल हो गए, जिनमें से अधिकांश अपने जीवन के 30 वसंत भी नही' देख पाए थे। इन शहीदों ने भारतीय सेना की शौर्य व बलिदान की उस सर्वोच्च परम्परा का निर्वाह किया, जिसकी सौगन्ध हर सिपाही तिरंगे के समक्ष लेता है। इन रणबाँकुरों ने भी अपने परिजनों से वापस लौटकर आने का वादा किया था, जो उन्होंने निभाया भी, मगर उनके आने का अन्दाज निराला था। वे लौटे, मगर लकड़ी के ताबूत में। उसी तिरंगे मे लिपटे हुए, जिसकी रक्षा की सौगन्ध उन्होंने उठाई थी। जिस राष्ट्रध्वज के आगे कभी उनका माथा सम्मान से झुका होता था, वही तिरंगा मातृभूमि के इन बलिदानी जाँबाजों से लिपटकर उनकी गौरव गाथा का बखान कर रहा था। कोई भी युद्ध हथियारों के बल पर नहीं लड़ा जाता है, युद्ध लड़े जाते हैं साहस, बलिदान, राष्ट्रप्रेम व कर्त्तव्य की भावना से और हमारे भारत में इन जज्बों से भरे युवाओं की कोई कमी नहीं है।
  "शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मिटने वालों का यही बाकी निशां होगा।"
आज हम कारगिल विजय दिवस मनाते हुए उन शहीद सैनिकों को याद करते हैं जिन्होंने अपने जीवन का समर्पण देश के लिए हंसते-हंसते किया! हमारे देश की माटी की यह मिसाल रही है कि हमारे देश में एक से एक वीर सपूत योद्धा जन्मे हैं,जिन्होंने मातृभूमि के खातिर अपना सब कुछ न्यौछावर किया है! धन्य हैं ऐसे वीर योद्धा और उनके माता-पिता, भारत भूमि ऐसे वीरों से भरी पड़ी है! हमको आज इस कारगिल विजय दिवस पर अपने मन से यह संकल्प करना चाहिए यदि देश की सीमा पर सैनिक सर्वस्व न्योछावर कर कर सकते है', तो हम सब भी अपने कर्तव्य को देश के अंदर निभा सकते हैं ! देश बाहर से सुरक्षित सैनिकों के द्वारा रहेगा तो देश अंदर से सुरक्षित हम जैसे अच्छे नागरिकों के द्वारा रहेगा! कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रगान एवं वंदे मातरम का गायन किया गया!


मप्र के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने बीजेपी के दो विधायकों को अपने पाले में लाकर अकेले बीजेपी के दबाब को ही कम नही किया बल्कि अपनी ही पार्टी में भी विरोधियों का मुंह बंद कर दिया है इस पूरे ऑपरेशन में पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की भी अदृश्य भूमिका रही है दिग्विजय सिंह लगातार चार दिन भोपाल में डेरा डाले रहे और कल शांम को ही दिल्ली रवाना हुए जब विधानसभा में 122 का आंकड़ा सामने आ गया। यहां उल्लेखनीय है कि कमलनाथ मुख्यमंत्री के रूप में दिग्गज कांग्रेसी नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की शह से बुरी तरह परेशान है उनके समर्थक मंत्री लगातार मुख्यमंत्री से अलग लाइन लेकर सरकार पर दबाव बनाए हुए है।

गुना से सिंधिया की अप्रत्याशित पराजय के बाद से तो सिंधिया समर्थक मंत्रियों ने पहले  प्रदेश अध्यक्ष के नाम पर फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिये  उनका नाम आगे बढाया।मंत्री इमरती देवी,प्रधुम्न सिंह तोमर,लाखन सिंह यादव,महेंद्र सिसोदिया, प्रभुराम चौधरी,उमंग सिगार,तुलसी सिलावट औऱ गोविंद राजपूत की गिनती सिंधिया कोटे में की जाती है।ये सभी मंत्री सिंधिया को मप्र कांग्रेस का अध्यक्ष बनबाने के लिये दबाब बनाते रहे है कुछ समय पहले तो कैबिनेट की बैठक में ही मंत्री प्रधुम्न सिंह तोमर औऱ मुख्यमंत्री के बीच तीखी झड़प तक हो गई थी मुख्यमंत्री को यहां तक कहना पड़ा कि मुझे पता है आप कहाँ से संचालित हो रहे है सीएम का इशारा सिंधिया की तरफ ही था।सिंधिया समर्थक मंत्री दिल्ली और भोपाल में डिनर आयोजित कर भी अलग लाइन में खड़े दिखने की कोशिशें करते रहे है।

यह तथ्य है कि मप्र में मुख्यमंत्री कमलनाथ को जितनी चुनौती बीजेपी से मिलती रही है कमोबेश उतनी ही सिंधिया कैम्प से भी। नया ऑपरेशन बीजेपी असल मे कमलनाथ का दोनो दबाब से मुक्त होने का प्रयास है।जिन नारायण त्रिपाठी औऱ शरद कोल को मुख्यमंत्री अपने पाले में लाये है वे मूलतः कांग्रेसी ही है और बीजेपी में इनकी एंट्री तबके सीएम शिवराज सिंह चौहान और संगठन महामंत्री रहे अरविंदर मेनन ने कराई थी।दोनो विधायक कांग्रेस के पाले में जाने से पहले शिवराज सिंह चौहान से भी मिले थे।नारायण त्रिपाठी सतना जिले की मैहर सीट से पहली बार समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधायक बने थे फिर बाद में वे कांग्रेस में शामिल होकर सिंधिया की सिफारिश पर टिकट भी पा गए और जीत भी गए।

विंध्य की राजनीति मे ठाकुर बनाम ब्राह्मण की सियासत में नारायण त्रिपाठी अजय सिंह राहुल भैया के घुर विरोधी है 2014 में जब अजय सिंह सतना  से लोकसभा का चुनाव लड़े तो कांग्रेस विधायक रहते हुए नारायण त्रिपाठी ने खुलकर बीजेपी के पक्ष में काम किया और अजय सिंह बहुत ही मामूली अंतर से चुनाव हार गए इस हार के लिये नारायण त्रिपाठी को जिम्मेदार माना गया। तबके मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने नारायण त्रिपाठी को इनाम बतौर बीजेपी ज्वाइन कराकर उपचुनाव करा दिया।मुख्यमंत्री की बात पर मैहर की जनता ने नारायण त्रिपाठी को जिता भी दिया।2018 में अपनी अकूत दौलत के बल पर नारायण त्रिपाठी फिर से जीतने में सफल रहे।कमोबेश दूसरे विधायक शरद कोल भी कांग्रेस  से आए है,उनके पिता अभी भी शहडोल जिले में कांग्रेस के पदाधिकारी है।
दंड विधान के जिस विधेयक पर मत विभाजन में कांग्रेस को 229 सदस्यीय सदन में 122 सदस्यों का समर्थन मिला है उनमें 114 कांग्रेस 2 बसपा एक सपा और चारों निर्दलीयों के साथ दो बीजेपी सदस्य शामिल रहे है  इसमें स्पीकर ने वोट नही दिया। इस नए राजनीतिक घटनाक्रम में मुख्यमंत्री कमलनाथ जहां सामने नजर आ रहे है वही पर्दे के पीछे से बिसात बिछाने का काम दिग्विजय सिंह ने किया।मप्र की सियासत में इस समय दिग्विजय औऱ कमलनाथ की युगलबंदी सिंधिया के लिये लगातार आइसोलेट कर रही है क्योंकि सिंधिया समर्थक मंत्री लगातार सार्वजनिक रूप से दबाब बनाकर सरकार के इकबाल को कमजोर करने में लगे है।दूसरी तरफ बीजेपी भी आये दिन सरकार को धमकाने के अंदाज में आंखे दिखाती रही है। 

ऑपरेशन कर्नाटक के  समय से ही कमलनाथ औऱ दिग्विजय की जोड़ी बीजेपी के छह विधायको पर काम कर रही थी।विंध्य के इन दो विधायकों के अलावा बुंदेलखंड के एक पूर्व मंत्री और सीहोर तथा सिवनी के विधायक भी कांग्रेस के राडार पर है।सतना जिले के ही एक दूसरे विधायक जो एक बड़े सियासी खानदान से है कांग्रेसी प्रबंधकों के निशाने पर है।इन सभी के साथ समानता यह है कि ये मूलतः बीजेपी के न होकर कांग्रेसी ही है।

कमलनाथ बीजेपी के खेमे में सेंध लगाकर मनोवैज्ञानिक रुप से बीजेपी के साथ कांग्रेस के सिंधिया कैम्प को भी स्पष्ट और सख्त सन्देश देना चाहते है। फिलहाल बीजेपी के लिये मप्र में बिल्कुल अप्रत्याशित हालात बन गए है। उसकी समस्या असल में उस कार्य संस्क्रति की है जिसमे बाहर से आये नेताओं को आसानी से समायोजित होने में बहुत ही मुश्किल आती है। पूर्व मंत्री और नेता प्रतिपक्ष रहे राकेश चौधरी की दुर्गति जगजाहिर है। पूर्व मंत्री बालेंदु शुक्ला,प्रेमनारायण ठाकुर,असलम शेर खान, भागीरथ प्रसाद, जैसे बीसियों उदाहरण मप्र में है जो बीजेपी में आकर अलग थलग होकर रह गए।
बीजेपी के साथ इस समय समस्या मप्र के नेतृत्व को लेकर भी है पूर्व सीएम शिवराज सिंह निसन्देह मप्र के एकमात्र लोकप्रिय नेता है पर वे न प्रदेश अध्यक्ष है न नेता विपक्ष लेकिन मप्र की सियासत उनके बगैर पूरी नही है,यही पेच बीजेपी के लिये भी बुनियादी रूप से परेशानी का सबब है।मुख्यमंत्री के रूप में जिस तरह से शिवराज सिंह एक टीम बनाकर सत्ता और संगठन को हैंडिल किया करते थे वो बात इस समय मप्र की बीजेपी में नजर नही आ रही है। नारायण त्रिपाठी औऱ सतना के बीजेपी सांसद गणेश सिंह के बीच लोकसभा चुनाव के बाद से ही जबरदस्त जंग छिड़ी हुई थी बीजेपी  संगठन ने इसे बहुत हल्के में लिया ताजा घटनाक्रम असल मे इसी टीम स्प्रिट के अभाव का नतीजा ही है।जिन विधायकों का जिक्र उपर किया गया है उनके बारे में सरकार बदलने के साथ ही सार्वजनिक रूप से चर्चाओं का बाजार गर्म है लेकिन क्या एहतियात बरता गया?यह सामने ही है।नेता विपक्ष कोई असरकारी औऱ स्वीकार्य भूमिका में नजर नही आ पाए है।फिलहाल बीजेपी के लिये मप्र में चुनोती अब ज्यादा बड़ी हो गई है क्योंकि 122 विधायक का मतलब कमलनाथ  सरकार को नही अब  खतरा बीजेपी को अपना घर बचाने का है।

वैसे दो विधायक को अपने पाले में लाने से कमलनाथ बेफिक्र होकर नही बैठ पाएंगे क्योंकि अगर दोनो इस्तीफा देकर चुनाव लड़ते है तो उनके जीतने की संभावना फिफ्टी फिफ्टी ही है दूसरा नारायण त्रिपाठी को किसी भी बड़ी भूमिका में विंध्य के नेता अजय सिंह राहुल किसी भी सूरत में स्वीकार्य नही करेंगे क्योंकि उनके राजनीतिक पराभव में त्रिपाठी एक बड़ा फैक्टर रहे है जाहिर है ये निर्णय केवल बीजेपी और सिंधिया ही नही विंध्य के नेता अजय सिंह के लिये भी आसानी से पचाने वाला नही है।उधर बीजेपी भी अब आक्रमक होकर नए ऑपरेशन का आगाज करेगी जैसा कि इस खेल के सिद्धहस्त पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने कहा है कि खेल शुरु कांग्रेस ने किया है पर खत्म हम ही करेंगे।इसलिये मप्र में सियासी रोमांच तेजी से बढ़ेगा यह तय है।

भोपाल- मध्यप्रदेश में गुरुवार का दिन चोट खाए विपक्ष और सत्ताधारी कांग्रेस ने अगली रणनीति बनाने में गुजारा। दोनों ही पार्टियां बंद कमरों में अगले दांव से एक-दूसरे को चित करने के लिए मंथन में मशगूल रहे।
  नेताओं की बैठकों का दौर चला। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने जहां चेहरे पर आई शिकन को छुपाने की कोशिश की, वहीं कांग्रेस ने अपना उत्साह दिखाने में परहेज किया। राज्य की सियासत का मिजाज बदलने लगा है, भाजपा जहां कांग्रेस पर खुलेतौर पर लोकतंत्र की हत्या करने का आरोप लगा रही है, वहीं कांग्रेस की ओर से गोवा और कर्नाटक का जिक्र किया जा रहा है। महत्वपूर्ण यह है कि राज्य में दोनों दलों के मुखिया भाजपा के राकेश सिंह और कांग्रेस के कमलनाथ किसी तरह का हमला करते नजर नहीं आ रहे।
राजधानी के भाजपा कार्यालय में पूरे दिन गहमा-गहमी रही। संगठन के पदाधिकारियों के अलावा प्रदेशाध्यक्ष राकेश सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव, पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह और नरोत्तम मिश्रा का अधिकांश समय विचार-विमर्श के बीच बीता। पार्टी आगे किस तरह से बढ़े इस पर सभी नेताओं ने अपनी अपनी राय रखी। साथ ही उन दो विधायकों- नारायण त्रिपाठी व शरद कोल पर पार्टी का क्या रुख हो, इस पर भी चर्चा हुई। पार्टी फिलहाल जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं लेना चाहती।
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने सरकार के भविष्य पर फिर सवाल उठाए हैं और कहा, "मध्यप्रदेश में कर्नाटक से बुरा हाल है, वहां दो दलों का अनैतिक गठबंधन था, मगर यहां तो स्थिति उससे भी बदतर है, क्योंकि बसपा, सपा, निर्दलीय विधायक कोई सैद्धांतिक आधार पर समर्थन नहीं दे रहे हैं, बल्कि स्वार्थो की पूर्ति के लिए दे रहे हैं। जिस दिन स्वार्थ पूरे नहीं हुए, उस दिन गठबंधन टूट जाएगा और सरकार गिर जाएगी। इस सरकार का सात माह चलना भी बहुत बड़ी घटना है।"
एक तरफ जहां भाजपा के नेता रणनीति बनाने में लगे रहे तो दूसरी ओर कांग्रेस भी इसमें पीछे नहीं रही। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने पूरे दिन मंत्रियों से अलग-अलग चर्चा की। सूत्रों का कहना है कि मंत्रियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे विधायकों में किसी तरह की नाराजगी न होने दें। मंत्रियों पर पहले से तीन से चार विधायकों से लगातार संपर्क में रहने और उनकी मांगों को पूरा के निर्देश दिए जा चुके हैं।
कमलनाथ की ओर से गुरुवार को बुधवार के घटनाक्रम पर कोई बयान नहीं आया। उन्होंने राज्य के विकास को लेकर ट्वीट किया, "हम प्रदेश को विकास की दृष्टि से देश में शीर्ष पर ले जाना चाहते हैं। हम प्रदेश के विकास का एक नया नक्शा बनाना चाहते हैं। प्रदेश हित हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है, हम प्रदेश को दलगत राजनीति में बांटना नहीं चाहते।"
कमलनाथ ने एक अन्य ट्वीट में कहा, "हम विपक्ष से भी शुरू से यही अपेक्षा कर रहे हैं कि वो सकारात्मक राजनीति करते हुए प्रदेश के विकास में हमें सहयोग करें, हमें जनादेश मिला है। विपक्ष उसका सम्मान करे। हम अभी भी विपक्ष से प्रदेश हित में, प्रदेश के विकास के लिए सहयोग की उम्मीद व अपेक्षा करते हैं।"
राजनीति के जानकारों का अनुमान है कि आने वाले दिनों में राज्य की सियासत में उठापटक का दौर जारी रहेगा और दोनों ही दल एक-दूसरे को कमजोर करने में नहीं चूकेंगे।

मध्‍यप्रदेश विधानसभा में मतविभाजन के दौरान भाजपा के दो विधायकों ने कांग्रेस का साथ दिया था।

भोपाल। मध्य प्रदेश विधानसभा में बुधवार को हुए हाई वोल्टेज पॉलिटिकल ड्रामा के बाद अब विपक्षी दल भाजपा की ओर से संभावित पलटवार से कमलनाथ सरकार आशंकित है।

भाजपा नेता एवं पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा की चेतावनी के बाद कांग्रेस ने अपना घर मजबूत करने के लिए अपनी कमजोर कड़ियों पर निगरानी बढ़ा दी है। सियासी प्रबंधन के तहत कांग्रेस विधायकों को एकजुट रखने की मंत्रियों को विशेष जिम्मेदारी सौंपी गई है, वहीं दूसरी ओर भाजपा का प्रबंधन तंत्र भी भावी रणनीति के तहत सियासी जमावट के लिए विचार मंथन में जुट गया है।

कांग्रेस और भाजपा में सियासी प्रबंधन के रणनीतिकार भोपाल से लेकर दिल्ली तक अचानक सक्रिय हो गए हैं। विधायक दल की कमजोर कड़ियों को चिन्हित कर उन पर फोकस किया जा रहा है। दोनों ही दलों में इस बात को लेकर सतर्कता बढ़ गई है।

भाजपा के रणनीतिकारों का कहना है कि मैहर विधायक नारायण त्रिपाठी और ब्यौहारी विधायक शरद कोल का असंतोष वे समझ नहीं पाए और धीरे-धीरे वे कांग्रेस के पाले में चले गए। लेकिन, यह भी दावा किया जा रहा है कि दलबदल जैसी कोई स्थिति नहीं है।

पाला बदलने के बाद सरकार ने दोनों विधायकों की सुरक्षा बढ़ा दी है। मंत्रियों को भी जवाबदारी सौंपी गई है कि अपने क्षेत्र के विधायकों के लगातार संपर्क में बने रहें। कांग्रेस संगठन के दिग्गज नेता और मंत्रिगण गुरुवार को दिन में यह दावा करते रहे कि विधानसभा में मत विभाजन के जरिए हुआ फ्लोर टेस्ट (दो विधायकों की टूट) तो ट्रेलर मात्र है। अभी भाजपा के पांच अन्य विधायक भी उनके लगातार संपर्क में बने हुए हैं।

संख्या बल को लेकर भाजपा सतर्क

कर्नाटक में कुमार स्वामी सरकार गिरने के बाद ही मप्र में कांग्रेस सरकार को लेकर बयानबाजी तेज हो गई थी। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने पहले ही कह दिया था कि 'कर्नाटक से चली हवा अब मप्र तक पहुंचेगी, क्योंकि प्रदेश में लूटखसोट का माहौल है।"

भार्गव के अलावा डॉ. नरोत्तम मिश्रा भी कह चुके हैं कि 'खेल कांग्रेस ने शुरू किया-खत्म हम करेंगे।" भाजपा संगठन यह भी स्पष्ट कर चुका है कि कांग्रेस के पक्ष में मतदान करने वाले विधायकों पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। दरअसल, भाजपा अपने संख्या बल को लेकर अत्यधिक सतर्कता बरत रही है।

मजबूती से जमी है सरकार: सलूजा

प्रदेश में कमलनाथ की सरकार अंगद के पैर की तरह पूर्ण बहुमत के साथ मजबूती से जमी हुई है। कांग्रेस विधायक दल और सहयोगी विधायक पूरी तरह एकजुट हैं और कहीं कोई कमजोर अथवा टूटने वाली कड़ी नहीं है।

- नरेंद्र सलूजा, मीडिया समन्वयक, मध्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष

अभी कर्नाटक में भाजपा को एक बड़ी जीत मिले 24 घंटे भी पूरे नहीं हुए थे कि मध्य प्रदेश में उन्हें एक झटका लग गया. भाजपा के दो विधायकों ने विधानसभा में एक बिल के लिए कांग्रेस के हक में वोटिंग कर दी. इससे आगबबूला भाजपा क्या करती है, देखना दिलचस्प होगा.


इधर कर्नाटक का नाटक खत्म हुआ तो उधर मध्य प्रदेश में सियासी हलचल शुरू हो गई है. कर्नाटक में करीब 22 दिनों तक इस बात को लेकर बहस होती रही कि कुमारस्वामी सरकार फ्लोर टेस्ट का सामना कब करेगी. कुमारस्वामी ने भी कई बार फ्लोर टेस्ट को टाला, लेकिन 23 जुलाई मंगलवार का दिन कुमारस्वामी के लिए काफी अमंगल साबित हुआ. कर्नाटक विधानसभा में हुए फ्लोर टेस्ट में उनकी सरकार फेल हो गई और भाजपा को बहुमत मिल गया. अभी कर्नाटक में भाजपा को एक बड़ी जीत मिले 24 घंटे भी पूरे नहीं हुए थे कि मध्य प्रदेश में उन्हें एक झटका लग गया. भाजपा के दो विधायकों ने विधानसभा में एक बिल के लिए कांग्रेस के हक में वोटिंग कर दी.


लोकसभा चुनाव के बाद से ही इस बात के कयास लगाए जाने लगे थे कि कर्नाटक सरकार कभी भी गिर सकती है. इसकी वजह ये थी कि लोकसभा चुनाव में कर्नाटक की 28 सीटों में से 25 सीटों पर भाजपा ने कब्जा कर लिया था. वैसे जो डर कर्नाटक के लिए था, वही डर मध्य प्रदेश के लिए भी था. मध्य प्रदेश के 29 लोकसभा सीटों में से 28 पर भाजपा ने किया, जबकि कांग्रेस के खाते में सिर्फ एक सीट आई. अब कर्नाटक सरकार गिर चुकी है और जो भाजपा के दो विधायकों ने किया है, उसने कांग्रेस को मजबूत नहीं किया, बल्कि भाजपा को गुस्सा दिलाने वाला काम किया है. वो कहते हैं, घायल शेर ज्यादा खतरनाक होता है. इस समय भाजपा की मध्य प्रदेश में हालत किसी घायल शेर से कम नहीं कही जा सकती है. कांग्रेस फिलहाल तो जश्‍न मना रही है. लेकिन ये खुशी कब तक कायम रहेगी, देखना होगा.


इन 2 विधायकों ने भाजपा को गु्स्सा दिलाया है !

ये बात बुधवार की है. मध्य प्रदेश विधानसभा में क्रिमिनल लॉ (मध्य प्रदेश अमेंडमेंट) बिल 2019 के लिए वोटिंग हो रही थी. कुल 122 विधायकों ने कांग्रेस सरकार के हक में वोट किया, जिसने पिछले ही साल दिसंबर में सत्ता संभाली है. कांग्रेस के 120 विधायकों के अलावा भाजपा के भी 2 विधायकों ने कांग्रेस के हक में वोट किया. इनमें एक हैं मैहर से चुने गए नारायण त्रिपाठी और दूसरे हैं बेओहारी से चुनकर आए शरद कोल. अभी कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार गिरे 24 घंटे भी पूरे नहीं हुए थे कि मध्य प्रदेश में सियासी हलचल शुरू हो गई. भले ही कांग्रेस को लग रहा हो कि ये दो विधायक उनकी नैय्या के खेवइया साबित होंगे, लेकिन उन्हें ये बिल्कुल नहीं भूलना चाहिए कि अभी कांग्रेस की नाव उस मझधार में है, जहां कुछ भी हो सकता है. भाजपा के इन दो विधायकों ने पार्टी को गुस्सा दिलाने का काम किया है. और अगर इन दोनों विधायकों को तोड़ने का काम कांग्रेस का है, तो अब भाजपा 2 बदले कितने विधायक तोड़ेगी, ये देखने वाली बात होगी.

ये है विधायकों की घर वापसी

त्रिपाठी और कोल ने अभी तक भाजपा से इस्तीफा नहीं दिया है, लेकिन ये तय है कि वह भाजपा का दामन छोड़कर कांग्रेस का हाथ थामने वाले हैं. इसकी एक वजह तो यही है कि उन्होंने विधानसभा में कांग्रेस को साथ दिया है और दूसरी वजह ये है कि वह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुरेश पचौरी से उनके घर जाकर मिले, जिसकी तस्वीर भी खूब वायरल हो रही है. आपको बता दें कि पहले ये दोनों विधायक कांग्रेस में ही थे, जो बाद में भाजपा में शामिल हो गए. उन्होंने कहा है कि अब उनकी घर वापसी हो रही है. वहीं दूसरी ओर कमलनाथ ने कहा है- भाजपा रोज कहती थी कि हमारी सरकार किसी भी दिन गिर सकती है. हालांकि, विधानसभा में बिल की वोटिंग के दौरान भाजपा के दो विधायकों ने हमारे हक में वोट दिया.

मध्य प्रदेश का हो सकता है कर्नाटक जैसा हाल

जब कर्नाटक में विधानसभा चुनाव हुए थे तो भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, लेकिन किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था. उस समय कांग्रेस और जेडीएस ने भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए हाथ मिला लिया था. चुनाव के बाद कांग्रेस-जेडीएस ने जो भाजपा के साथ किया था, उसका बदला तो भाजपा ने अब ले ही लिया है. उसने कांग्रेस-जेडीएस के करीब 15 विधायक तोड़ दिए. अब मध्य प्रदेश में कांग्रेस खुद को मजबूत करने के लिए भाजपा के विधायक तोड़ रही है. ऐसे में भाजपा का आग बबूला होना तो बनता है. तनिक भी हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर भाजपा अपने 2 विधायक टूटने के बदले कांग्रेस के 20 विधायक तोड़ दे.


- आनंदी बेन पटेल 29 को उत्तर प्रदेश के राज्यपाल का संभालेंगी पद


भोपाल। मध्यप्रदेश के नए राज्यपाल लालजी टंडन 28 जुलाई की शाम को भोपाल आएंगे। वे 29 जुलाई को मध्यप्रदेश के राज्यपाल पद की शपथ  लेंगे। इसको लेकर राजभवन  में तैयारी शुरू कर दी गई है। टंडन अभी बिहार के राज्यपाल हैं। टंडन के मध्यप्रदेश के राज्यपाल पद की शपथ लेने तक आनंदी बेन मध्यप्रदेश की राज्यपाल बनी रहेंगीं।


 

राज्यपाल आनंदी बेन को उत्तर प्रदेश की कमान दी गई

दरअसल हाल ही में मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों के तबादले किए गए थे। इसमें आनंदी बेन पटेल और लालजी टंडन के नाम भी शामिल थे। बिहार के राज्यपाल टंडन को उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल को उत्तर प्रदेश की कमान दी गई थी। जबकि, प्रख्यात वकील और जनता दल के पूर्व सांसद जगदीप धनखड़ को पश्चिम बंगाल का राज्यपाल नियुक्त किया गया है। तो वहीं, त्रिपुरा का राज्यपाल रमेश बैस को नियुक्त किया गया है।

 

 

 

29 को शपथ ग्रहण होगा

मध्यप्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल को उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई है। 29 जुलाई को आनंदी बेन भी उत्तर प्रदेश के राज्यपाल पद की शपथ ले रही हैं। दरअसल संवैधानिक व्यवस्था के तहत एक राज्य में दो राज्यपाल नहीं रह सकते। संविधान में यह भी व्यवस्था है कि राज्यपाल का पद रिक्त भी नहीं रह सकता। इसलिए जब आनंदी बेन पटेल उत्तर प्रदेश के राज्यपाल का पद नहीं संभालेंगी तक बिहार के राज्यपाल टंडन वहां की जिम्मेदारी नहीं छोड़ सकते। इसलिए तय हुआ है कि टंडन 28 जुलाई को भोपाल आ जाएंगे। 29 को शपथ ग्रहण होगा, उसी दिन आनंदी बेन उत्तर प्रदेश पहुंचकर राज्यपाल पद संभाल लेंगीं।

 

गुजरात में आनंदी बेन पटेल 
मध्यप्रदेश की राज्यपाल आनंदी बेन पटेल वर्तमान में अपने गृहनगर गुजरात में हैं। उनके सीधे ही गुजरात से उत्तर प्रदेश पहुंचने की संभावना है।

 


मध्यप्रदेश के दो विधायकों की क्रास वोटिंग से मध्यप्रदेश की समूची भाजपा सन्निपात में पहुंच गई है। कर्नाटक में परचम फहराने वाली भाजपा को मध्यप्रदेश के अपने ही गढ़ में आज अचानक मुंह की खानी पडी है। इस अचानक हुए घटनाक्रम में कमलनाथ सरकार जरूर एक प्रस्ताव पर 122 विधायकों का समर्थन हासिल कर चुकी है। लेकिन इस सदमे से अब भाजपा एकजुट हो गई है।
अभी सायं पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के घर भाजपा के पूर्व मंत्री व विधायकों का पहुंचना शुरू हो गया है। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव से लेकर कई बडे नेता शिवराज के बंगले पहुंच गये हैं। पूर्व मंत्री व भाजपा से प्रदेश के दिग्गज नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा भी वहां जमे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा को भी आलाकमान भोपाल भेज रहा है। ताकि स्थिति कंट्रोल की जा सके।
पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने तो इस घटनाक्रम के बाद स्पष्ट कह दिया है कि कमलनाथ सरकार ने जो खेल शुरू किया है अब इसे खत्म हम करेंगे। इससे जाहिर है  भाजपा भी अपने तेवर में आ गई है, अब केवल भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के इशारे का इंतजार कर रही है।

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