मंथनन्यूज दिल्ली जापान के ऊपर से मिसाइल दागना किसी भी हाल में उत्तर कोरिया का सबसे भड़काऊ कदम है. पिछले दो दशक में ऐसा तीसरी बार हुआ है जब उत्तर कोरिया ने जापान के ऊपर से कोई मिसाइल टेस्ट किया है.

यह ध्यान देने योग्य है कि उत्तर कोरिया ने अमरीकी प्रशांत क्षेत्र गुआम की ओर मिसाइल दागकर अच्छा नहीं किया है क्योंकि अब ऐसा कुछ हो सकता है जो अमरीकी सेना की प्रतिक्रिया को बढ़ा सकता है.

इस महीने की शुरुआत में ट्रंप प्रशासन के दावे को भी यह दिखाता है. वॉशिंगटन और प्योंगयांग के बीच कई बार ख़तरों की चेतावनी के बाद उत्तर कोरियाई शासन ने अपने परमाणु विचार को रोक दिया था.

जापान के ऊपर मिसाइल सैन्य कार्रवाई का पहला कदम

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परमाणु हथियार का जवाब

लेकिन इस बार फ़िर उत्तर कोरिया को लेकर उसी सवाल का सामना किया जा रहा है कि उत्तर कोरिया द्वारा बैलिस्टिक मिसाइलों और परमाणु हथियारों को लेकर उसकी तेज़ी का जवाब क्या होगा.

साथ ही यह भी सवाल रहेगा कि अगर प्योंगयाग इन कार्यक्रमों को नहीं रोकता है और वह अपने निशाने के दायरे में अमरीका को भी शामिल कर लेता है तो क्या अमरीका और पूरी दुनिया परमाणु हथियार संपन्न उत्तर कोरिया के साथ रह पाएगी?

ब्रिटेन, फ़्रांस, अमरीका, चीन और रूस ऐसे पांच देश हैं जो घोषित रूप से परमाणु हथियार संपन्न हैं.

इनमें से ज़्यादा ने यह परमाणु हथियार द्वितीय विश्व युद्ध के परिणामों के बाद बनाया था क्योंकि इनमें से अधिकतर देशों ने दो जापानी शहरों पर अमरीका का परमाणु हमला देखा था. इस परमाणु क्लब में सबसे आख़िर में चीन जुड़ा, उसने 1960 के मध्य में हथियार विकसित कर लिए थे.

उत्तर कोरिया की मिसाइल से डरना ज़रूरी क्यों?

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGESImage captionसंयुक्त राष्ट्र द्वारा उत्तर कोरिया पर लगे हैं कई प्रतिबंध

परमाणु अप्रसार की संधि

इसके बाद परमाणु हथियार के प्रसार को रोकने को लेकर शुरू की गई कोशिशें भी उल्लेखनीय रूप से सफ़ल रहीं. 1970 में अस्तित्व में आई परमाणु अप्रसार संधि ने भी इसमें काफ़ी योगदान दिया.

इसके द्वारा परमाणु हथियारों से संपन्न राष्ट्रों और जिनके पास ये हथियार नहीं हैं उन राष्ट्रों ने इसके अप्रसार को लेकर सहमति जताई. परमाणु हथियारों से संपन्न राष्ट्रों को अपने हथियार कम करने थे जबकि ग़ैर-परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्रों को परमाणु हथियार न बनाने की शर्त पर यह तकनीक हासिल करनी थी.

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGESImage captionउत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन

इसके बावजूद भी इराक़, ईरान और लीबिया जैसे देशों ने हथियारों को विकसित किया. इस संधि पर हस्ताक्षर न करने वाले इसराइल, भारत और पाकिस्तान जैसे देशों ने भी परमाणु हथियार विकसित किए.

लेकिन इन देशों द्वारा बनाए गए हथियार विवादास्पद रहे और इन कार्यक्रमों को इस तरीक़े से देखा गया कि वह अपने क्षेत्रीय अस्तित्व के लिए किए गए.

उत्तर कोरिया पर संयुक्त राष्ट्र की आपात बैठक

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उत्तर कोरिया भी भारत-पाक की श्रेणी में

तो इसका मतलब यह समझा जाए कि उत्तर कोरिया भी इसराइल, भारत और पाकिस्तान की श्रेणी में है?

व्यावहारिक उद्देश्य से देखा जाए तो उत्तर कोरिया परमाणु सशस्त्र राष्ट्र है. हालांकि, अमरीकी शहरों को निशाना बनाने की उसकी क्षमता पर अभी संदेह है.

उत्तर कोरिया को लेकर यह स्पष्ट है कि वह एक लोकतांत्रिक राष्ट्र नहीं है और न ही वह अमरीका के एक सहयोगी के रूप में दिखाई देता है. वह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था से विचित्र तरीके से अलग हो चुका है और मौलिक रूप से उसका शासन कमज़ोर और विफल नज़र आता है.

उसके परमाणु हथियार विकसित करने के मकसद में क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता नहीं दिखती है बल्कि इसके ज़रिए वह अमरीका को निशाना बनाने का प्रयास करता रहा है.

300 शब्दों में उत्तर कोरिया का मिसाइल कार्यक्रम

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अमरीका और उत्तर कोरिया रह पाएंगे

तो क्या अमरीका और उत्तर कोरिया परमाणु 'दुश्मनों' के तौर पर एक साथ रह सकते हैं? क्या प्योंगयांग के मुकाबले अमरीका के परमाणु हथियार का हमला कहीं अधिक घातक होगा?

इसका जवाब देते हुए अनुभवी अमरीकी रणनीतिक विश्लेषक टॉनी कॉर्ड्समैन कहते हैं कि मिसाइल का परीक्षण और उसके बाद लगातार मिसाइलों का परिचालन करना एक लंबा काम है.

क्या प्योंगयांग अमरीका के ख़िलाफ़ अपनी ताक़त का इस्तेमाल करेगा? इस सवाल पर टॉनी कहते हैं कि एक अप्रमाणित मिसाइल को अप्रमाणित जगह पर बिना सटीकता और विश्वसनीयता के दागना केवल मूर्खता दिखाता है.

टॉनी के विचार बताते हैं कि उत्तर कोरिया अपने लक्ष्य के क़रीब ज़रूर है, लेकिन इसको पूरा करने में एक सही नीति की आवश्यकता है.

इस बार जापान के ऊपर से उड़ी उत्तर कोरिया की मिसाइल

इमेज कॉपीरइटGETTY IMAGESImage captionअप्रैल में आसियान सम्मेलन में मिले थे चीन और उत्तर कोरिया के विदेश मंत्री

चीन का समर्थन

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने चीन को उत्तर कोरिया को अपने उद्देश्यों को लेकर पीछे हटने को कहा है. इसके मिश्रित परिणाम रहे हैं क्योंकि संयुक्त राष्ट्र द्वारा उत्तर कोरिया पर लगाए गए प्रतिबंधों का चीन समर्थन करता है जबकि चीन के उससे रिश्ते ठीक रहे हैं.

सबसे अहम बात यह है कि चीन नहीं चाहता कि उत्तर कोरियाई शासन मिटे और करोड़ों शरणार्थी सीमा पार करके उसके यहां आएं.

उत्तर कोरियाई शासन को लेकर कई विश्लेषकों का तर्क है कि वह इतना मूर्ख नहीं है जितना लगता है. उसके व्यवहार और कुछ चीज़ें वो जो चाहता है उसके पीछे तर्क होते हैं.

मंथनन्यूज दिल्ली समाजसेवी अन्ना हजारे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेटर लिखकर भ्रष्टाचार और किसानों की समस्‍याओं पर अपनी नाराजगी जाहिर की थी. हालांकि लेटर का जवाब नहीं मिलने पर अब अन्‍ना ने आंदोलन करने का फैसला लिया है.

अन्‍ना ने लेटर में लिखा था कि छह साल बाद भी भ्रष्टाचार को रोकने वाले एक भी कानून पर अमल नहीं हो पाया. लोकपाल, लोकायुक्त की नियुक्ति करने वाले और भ्रष्टाचार को रोकनेवाले सभी सशक्त बिलों पर सरकार सुस्ती दिखा रही है. किसानों की समस्याओं को लेकर स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट पर भी अमल नहीं किया जा रहा है. सरकार के इस रवैए से नाराज अन्ना हजारे ने लेटर में तमाम मसलों के बारे में लिखा था और अब कोई जवाब नहीं मिलने पर दिल्ली में आंदोलन करने का फैसला लिया है.

6 साल हो गए आंदोलन के

अन्ना हजारे  ने भ्रष्टाचार मुक्त भारत को बनाने के लिए 2011 में रामलीला मैदान में आंदोलन किया था. इसके बाद 27 अगस्त 2011 के दिन भारतीय संसद में ‘Sense of the House’ से रिज्युलेशन पास किया गया था. इसमें केंद्र में लोकपाल, हर राज्यों में लोकायुक्त और सिटिजन चार्टर ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर जल्द से जल्द कानून बनाने का निर्णय किया गया था. इसके बाद अन्ना हजारे ने अपना आंदोलन स्थगित कर दिया था. इसे लेकर 6 साल गुजर चुके हैं.

'बीजेपी ने नहीं निभाया अपना वादा'

अन्ना हजारे ने मोदी को लिखे गए लेटर में कहा कि लोकपाल और लोकायुक्त कानून बनते समय संसद के दोनो सदनों में विपक्ष की भूमिका निभा रही बीजेपी ने भी इस कानून को पुरा समर्थन दिया था. इसके बाद हुए 2014 के लोकसभा चुनाव में आपकी पार्टी सरकार बनी. लोकपाल आंदोलन के बाद देश की जनता ने बड़ी उम्मीद से आपके नेतृत्व में नई सरकार को चुना था. वहीं नई सरकार को मुद्दों पर अमल करने के लिए पर्याप्त समय देना जरुरी था. अन्ना हजारे ने पिछले तीन सालों में कई बार पत्र लिखने का जिक्र भी किया, लेकिन पीएमओ से कोई जवाब नहीं मिला. इतना ही नहीं ना कभी मन की बात में लोकपाल और लोकायुक्त का जिक्र किया गया. उन्होंने लिखा है कि सत्ता में आने से पहले आपने आश्वासन दिया था कि भ्रष्टाचार मुक्त भारत बनाएंगे. हालांकि आप 3 साल से लोकपाल और लोकायुक्त की नियुक्ती नहीं कर सके. सुप्रीम कोर्ट ने भी आपकी सरकार को बार-बार फटकार लगाई है. मोदी ने कहा कि जिन राज्यों में बीजेपी की सरकारें हैं, वहां भी नये कानून के तहत लोकायुक्त नियुक्त नहीं किए गये हैं. इससे ये साफ है कि आप लोकपाल, लोकायुक्त कानून पर अमल करने के लिए इच्छाशक्ति नहीं दिखा रहे हैं.

किसानों की समस्‍या पर भी नहीं दिया जवाब

अन्ना हजारे ने देश में लगातार किसानों की आत्महत्या का भी जिक्र किया है. अन्‍ना के अनुसार, मौजूदा वक्त में खेती पैदावारी में किसानों को लागत पर आधारित दाम मिले इसलिए मैंने कई बार पत्र लिखा था. हालांकि न आपकी तरफ से कोई जवाब आया और न ही स्वामीनाथन कमिटी की रिपोर्ट पर कार्रवाई हुई. इसी वजह से पिछले कई दिनों से महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, तमिलनाडू, आंध्रप्रदेश, तेलंगना, हरियाणा, राजस्थान में किसान आंदोलन कर रहे हैं. साथ ही लेटर में अन्‍ना ने राजनैतिक पार्टियों को सूचना के अधिकार के दायरे में लाने की मांग भी की.

 

अब आंदोलन

अन्ना हजारे ने पत्र के जरिए कहा कि पिछले 3 साल में आपकी सरकार ने किसी पत्र का जवाब नहीं दिया. इसके लिए अब मैने दिल्ली में आंदोलन करने का निर्णय लिया है. जब तक लेटर में लिखें मुद्दों पर जनहित में सही निर्णय और अमल नहीं होता तब तक मैं आंदोलन दिल्ली में जारी रखुंगा. अन्ना हजारे ने अगले पत्र में आंदोलन की तारीख की घोषणा करने की बात कही है.

मंथनन्यूज नई दिल्ली 
डोकलाम विवाद खत्म होने के तुरंत बाद भारतीय सेना की जंगी तैयारियों को बेहतर करने की दिशा में सरकार ने एक बड़ा फैसला किया है। भारतीय सेना में एक बड़े सुधार के तहत नॉन ऑपरेशनल जिम्मेदारियों में तैनात 57 हजार अफसरों और सैनिकों की नए सिरे से तैनाती होगी और उन्हें ऑपरेशनल भूमिकाओं में लगाया जाएगा। इसके अलावा सेना में सिविलियनों को उन भूमिकाओं में लगाया जाएगा, जिन्हें निभाने के लिए सैनिकों की जरूरत नहीं है। ब्रिटिश शासन के जमाने से चली आ रही कुछ ऐसी सैन्य संस्थाओं को खत्म किया जाएगा, जिनकी जरूरत आज के दौर में नहीं मानी जा रही है।

सशस्त्र बलों की जंगी क्षमता बढ़ाने और रक्षा खर्चों को नए सिरे से बैलेंस करने के लिए मनोहर पर्रिकर के कार्यकाल में रक्षा मंत्रालय ने लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डीबी शेकतकर की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक कमिटी बनाई थी। कमिटी ने अपनी रिपोर्ट पिछले साल दिसंबर में सौप दी थी। रक्षा मंत्रालय ने कमिटी की 99 सिफारिशों को सशस्त्र बलों के पास भेजा, ताकि इन पर अमल की योजना बनाई जा सके। रक्षा मंत्री अरुण जेटली ने पहले चरण में इनमें से 65 सिफारिशों को मंगलवार को मंजूरी दे दी, ये सिफारिशें भारतीय सेना से जुड़ी हैं। मंत्रालय के इस फैसले की कैबिनेट को जानकारी दी गई। सरकार का मानना है कि इन सिफारिशों को लागू करने के दूरगामी नतीजे होंगे। 

सरकार ने कहा है कि इन सुधारों को 31 दिसंबर 2019 तक पूरा कर लिया जाएगा। अरुण जेटली ने बुधवार को बताया कि भारतीय सेना में 57 हजार अफसरों, जेसीओ और अन्य रैंक के कर्मियों के साथ सिविलियन कर्मचारियों को नए सिरे से तैनात किया जाएगा। सेना के अफसरों, जेसीओ और अन्य रैंक के लोगों को ऑपरेशन तैयारियों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा, जबकि सिविलियनों को बलों के दूसरे विभिन्न हिस्सों में तैनात किया जाएगा। 

शांति वाले इलाकों में आर्मी के अपने डाक संस्थानों और फार्मों को बंद किया जाएगा। कैबिनेट की सुरक्षा मामलों की समिति ने 39 फार्मों को समयबद्ध तरीके से बंद करने का फैसला पहले ही ले लिया है। इनमें करीब 25 हजार पशुओं का पालन किया जा रहा था। करीब 130 साल पहले ब्रिटिश राज में इस तरह के फार्मों की शुरुआत हुई थी, जब बाजार में दूध आदि की कमी थी। नैशनल कैडेट कोर की क्षमता को बेहतर करने की बात कही गई है। सूत्रों ने कहा है कि इसमें सेना से रिटायर हुए लोगों को काम पर लगाया जाएगा, जबकि इसमें एनसीसी से जुड़े सेवारत अफसरों को ऑपरेशनल भूमिकाओं में भेजा जाएगा। वर्कशॉप, डिपो और ट्रांसपोर्ट यूनिटों में भी बदलाव की तैयारी है। आर्मी में ड्राइवर और क्लर्क की भर्ती के मानक बेहतर बनाए जाएंगे।

मंथनन्यूज दिल्ली भारतीय रिजर्व बैंक ने नोटबंदी के बाद पुराने नोटों के सरकारी बैंकों में वापस आने से जुड़े आंकड़े बताए हैं. इसके बाद विपक्ष ने केंद्र सरकार पर हमला बोलना शुरू कर दिया है. सबसे पहला वार पूर्व वित्‍त मंत्री पी चिदंबरम ने किया है. आरबीआई के आंकड़ों पर तंज कसते हुए पी चिदंबरम ने सवाल किया कि क्‍या नोटबंदी काले धन को सफेद करने की योजना थी? 

आपको बता दें कि आरबीआई ने सालाना रिपोर्ट में खुलासा किया कि नोटबंदी के बाद 1000 रुपये और 500 रुपये के 99 प्रतिशत नोट वापस आए हैं. आरबीआई ने बताया कि कुल 15 लाख 44 हजार करोड़ के पुराने नोट बंद हुए थे. इनमें से 15 लाख 28 हजार करोड़ की रकम बैंकों में लौटी है. नोटबंदी के बाद पुराने 1,000 रुपये के कुल 632.6 करोड़ नोटों में से 8.9 करोड़ नोट अब तक नहीं लौटे हैं. रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी के बाद नोट की प्रिंटिंग की लागत में बड़ा इजाफा हुआ है.

कहा, हुआ नुकसान

पी चिदंबरम ने इन्‍हीं आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि नोटबंदी के फैसले से देश को आर्थिक नुकसाना उठाना पड़ा. पी चिदंबरम के मुताबिक आरबीआई ने कहा कि कुल 1544,000 करोड़ रुपये के 1,000 और 500 रुपये में से 16000 करोड़ रुपये के नोट वापस नहीं लौटे, जो कि लगभग 1 प्रतिशत के बराबर है. ऐसे में आरबीआई को शर्म करनी चाहिए कि उसने नोटबंदी का समर्थन किया.

आरबीआई को 16 हजार करोड़ रुपये का फायदा तो हुआ पर उसे नए नोटों की छपाई पर 21 हजार करोड़ रुपये खर्च करना पड़ा है. तंज कसते हुए पी चिदंबरम ने कहा कि ऐसे में यह फैसला लेने वाले वाले इकनॉमिस्‍ट को नॉबेल प्राइज मिलना चाहिए. यही नहीं पी चिदंबरम ने केंद्र पर सीधा हमला करते हुए कहा कि  जब 99 प्रतिशत नोट कानूनी रूप से बदले गए तो क्‍या नोटबंदी कालेधन को सफेद करने की कोई योजना थी?

आरबीआई ने दी यह रिपोर्ट

आरबीआई के मुताबिक वित्त वर्ष 2016-17 में 7.62 लाख नकली नोटों का पता चला, जबकि 2015-16 में 6.32 लाख नकली नोट पकड़े गए थे. रिजर्व बैंक ने कहा कि नोटबंदी के बाद नए नोटों की छपाई की लागत दोगुनी होकर 7,965 करोड़ रुपये हो गई, जो 2015-16 में 3,421 करोड़ रुपये थी.

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 8 नवंबर 2016 को देश में नोटबंदी का ऐलान करते हुए सर्वाधिक प्रचलित 500 और 1000 रुपये की करेंसी को प्रतिबंधित कर दिया था. इसके बाद केन्द्रीय बैंक ने पहले 2000 रुपये की नई करेंसी का संचार शुरू किया और कुछ दिनों बाद नई सीरीज की 500 रुपये की करेंसी का संचार शुरु किया.

मंथनन्यूज शिवपुरी । पूर्व विधायक एवं भाजपा के प्रदेश कार्यसमिति सदस्य वीरेन्द्र रघुवंशी के घर रात्रि लगभग 2:00 बजे चोरों ने ढावा बोला इस दौरान वीरेंद्र रघुवंशी  एवं विभा  रघुवंशी अपने घर पर ही ऊपर के कमरे में ही सो रहें थे ।
पर उन्हें घर में चोरो के होने का आभास नही हुआ ।हालांकि चोर  वहां से कुछ ले जा  पाने में असंभव रहे । पर उनने   कमरों के  सामान को उथल-पुथल कर खिडकी दरवाजो को तोडा ।  यहॉ सवाल कानून व्यवस्था पर भी उठता है जब विधायको और जन्प्रतिनिधियो के घर सुरक्षित नहीं । तब आम जनता  कहां से सुरक्षित हो सकती है ।पुलिस ने मौके पर पहुंचकर जॉच  शुरू की एवं चोरो का जल्द पता लगाने का प्रयास कर रही है।

मंथनन्यूज शिवपुरी

 पिछोर कांग्रेस  विधायक केपीसिंह ने एक दिवसीय  शिवपुरी  दौरे के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए कहां की ।कलेक्टर की गलती का परिणाम  हैं  एक अधिकारी गलती करता है और पूरे जिले के किसानों को भोगना पड़ता है मैंने मुख्यमंत्री से व्यक्तिगत और पत्र के माध्यम से कहा है कि कोई ऐसी व्यवस्था करें कि किसानों की फसलों. का सही आकलन हो ।हमारी बात पर आप अधिकारिक रूप से घोषणा नहीं कर सकते तो विधायक  के नाते तो समझे कि अगर  विधायक यदि कुछ कह रहे हैं तो वह भी सोच समझकर ही कह रहे होंगे यदि विधायक किसान है तो उसकी फसलों का आकलन न करें उसे माईनस कर  दें पर मुख्यमंत्री खुले मंच और सदन में तो किसानों की बात  करते हैं पर वह कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं उनकी कथनी करनी में फर्क है मध्यप्रदेश में अफसरशाही हावी है
और जब शासक कमजोर हो  मुख्यमंत्री हो या प्रधानमंत्री यदि वह कमजोर है तो अफसरशाही हावी रहती है मध्यप्रदेश में अफसरशाही का आलम तो यह है कि यदि अधिकारी कलेक्टर ने एक बार किसानों की फसलों का आकलन करा दिया तो उसे ऊपर बदला नहीं जाता और ना ही पुनः  सर्वे कराया जा सकता है एक बार अफसर ने जो लिख दिया तो लिख दिया उसकी बात स्वीकार कर ली जाती है चाहे वह सही हो या गलत मैंने मुख्यमंत्री  और राजस्व मंत्री दोनों को मेने  इस बात से अवगत कराया है  दोनों ने आश्वासन दिया था कि वह तहसीलों और जिलेवार यदि गलती पाई जाती है तो पुनः आकलन कराएंगे
इस दौरान उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए प्रभात झा के द्वारा ज्योतिरादित्य सिंधिया के लिए दिये गये बयान सिंधिया अमित शाह के निसाने  पर हैं। इस बार उन्हें गुना शिवपुरी संसदीय सीट से चुनाव जीतने के लाले पड़ जाएंगे। भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा के इस बयान पर केपी सिंह ने पटलवार करते हुए कहा कि प्रभात झा एक बार गुना शिवपुरी संसदीय सीट से चुनाव लड़ ले तो उन्हें पता चल जाएगा और तो वह ग्वालियर से लड़ले तो उन्हें अपनी औकात पता लग जाएगी। गुना से लडने की तो उनमें हिम्मत नही है

ज्योतिरादित्य सिंधिया को सीएम प्रोजेक्ट क्यों नहीं किया जा रहा है,
इसे लेकर केपी सिंह ने कहा कि कांग्रेस में ऐसी परिपाटी नहीं है कि किसी भी नेता को सीएम प्रोजेक्ट कर चुनाव लड़ा जाए। आलाकमान ही इसके लिए फैसला लेगा और उसका फैसला सर्वमान्य होगा।  

अल्पवर्षा के चलते कई जिले जल अभावग्रस्त घोषित हो गए हैं। ऐसे में किसानों को खासी परेशानी हो रही है। उनकी फसल चौपट हो गई है। ऐसे में किसानों की आत्महत्या के मामले सामने आएंगे।

 इसे लेकर केपी सिंह का कहना था कि सरकार को इसे लेकर जल्द कदम उठाना चाहिए।

 चुनावों की तैयारियों को लेकर केपीसिंह का कहना है कि चुनावों को लेकर कोई भी पार्टी पहले से तैयार नहीं करती है जबकि यह तो आमजन का मन है वह किसको चुनता है।

मंथनन्यूज दतिया जनसम्पर्क मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्र का दतिया के वार्डों में पेयजल समस्या का समाधान सुनिश्चित होने पर समारोह पूर्वक नागरिक सम्मान किया गया। डॉ. मिश्र ने इस अवसर पर कहा कि जनता की सदैव नि:स्वार्थ भाव से सेवा करना ही सरकार का कर्त्तव्य है। उन्होंने नागरिकों को आश्वस्त किया कि दतिया के नागरिकों की हर समस्या निदान के लिए हमेशा तत्पर रहूंगा।

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