प्रमाणों को झुठलाते परिणाम, पीडि़त वंचितों के बीच, प्रदर्शन


व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा
अहंकारी, सत्ता, समाज, व्यक्ति, सुसंगत का आभाव और कुचिन्तन के कारण उन कारकों की चर्चा प्रमाणों के साथ अवश्य प्रभावी ढंग से करने से नहीं चूकते जिनके परिणाम झूठे आंकड़ों के बिना पर संदिग्ध होते है। मगर जब पीडि़त वंचितों के बीच, सत्ता का भोड़ा प्रदर्शन समाज या व्यक्तियो के बीच सम्मानजनक स्थान पाने लगे, तो यह समुची व्यवस्था और समाज के लिये शर्मनाक भी है और दर्दनाक भी, फिर क्षेत्र जो भी हो। फिर चाहे वह सत्ता, समाज, व्यक्ति, संस्थायें, संगठन हो या फिर सभा और परिषदें।
        लेकिन सर्वाधिक अपेक्षा ऐसी स्थिति में उन सत्ता, परिषदों से आम पीडि़त, वंचितों को होती है जो राष्ट्र, राज्य जनकल्याण के लिये अस्तित्व में होती है। अगर ऐसी संस्थायें, संगठन, दल, समाज या स्वयं व्यक्ति, ऐसी किसी भी स्थिति परिस्थितियों का शिकार होने लगे, तो ऐसे में न तो इसे सुखद और न ही ऐसी स्थिति को सम्मानजनक कहा जायेगा।
        प्रमाणों को झुठलाते परिणाम किसी भी सभ्य समाज और व्यवस्था के लिये उस कलंक के समान है जो केवल कत्र्ता को ही कलंकित नहीं करता। बल्कि समुची व्यवस्था, समाज को भी कलंकित करते है। ऐसे में विद्या, विद्यवान, प्रतिभा ही नहीं, सभ्य, सुसंस्कृत हर युवा बुजुर्ग की जबावदेही बन जाती है कि वह अपनी महान सभ्यता, संस्कृति की रक्षा स्वयं अपने सद आचरण, व्यवहार बुद्धिमतता और अपने पूर्वजों की कृपा आर्शीवाद से करें। क्योंकि अब सेवा के नाम हमारे समाजों और व्यवस्था में छदम शॉरूमों, हॉट बाजारों की भरमार हो चली है और सुधार की जबावदेही हमारी बनती है। इसलिये अब विचार हमें करना है, कि हम कैसा समाज, व्यवस्था, संगठन, संस्थायें चाहते है।