व्ही.एस.भुल्ले
समाचार सेवा। 10 मई 2018
देखा जाये तो राजतंत्र को आजाद भारत से विदा लिये 70 वर्ष का लम्बा अर्सा बीत चुका है चूंकि अब लोकतांत्रिक व्यवस्था है और लोकतंत्र को संचालित करने वाली संस्थायें, संगठन जो भी हो और उत्तरदायित्व भी उनकी क्षमता अनुसार हो। मगर कत्र्तव्य निर्वहन के अर्थ आज भी वहीं है।
अब इसे हम अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं की सफलता माने या सत्तासीनो की असफलता की नई राज व्यवस्था स्थापित होने के 70 वर्ष बाद भी आज हम प्रमाणिक तौर पर यह कहने में सक्षम नहीं कि हमारी राज व्यवस्था में हमारे बच्चो को गुणवत्ता पूर्व सहज शिक्षा, स्वास्थ, शुद्ध पेयजल और 65 फीसद कामगार आबादी को काम, रोजगार मुहैया कराने में सफल रहे है। न हीं हम या हमारी सत्तायें यह प्रमाणिकता सिद्ध कर सकी कि राज्य का कोई भी नागरिक असुरक्षित नहीं।
मगर किसी भी राज व्यवस्था में उसका राजकोष अहम होता है जो नागरिकों से कर के रुप में प्राप्त कर, राज्य व जनकल्याण के लिये सुरक्षित या समय-समय पर सदउपयोग के लिये सुरक्षित रखा जाता है। लेकिन आज हम यह भी बताने में असफल, अक्षम है। कि नागरिकों से इक_ा राजकोष का धन सही मायने में पूर्ण निष्ठा ईमानदारी के साथ राज व्यवस्था व जनकल्याण में खर्च किया जा रहा है।
जिस राजकोष की रक्षा के लिये हमारे पूर्वज विद्ववान जिन लोगों से समाधान रहने की बात दोहराते रहे। शायद उस संदेश को भी हम सफल नहीं कर पाये। अर्थात लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिस तरह से राज्य जनकल्याण के नाम राजकोष का उलीचा चल रहा है उससे साफ हो जाता है कि स्वार्थवत सत्ताओं ने न तो पूर्व में ही और न ही वह वर्तमान में राज्य और जन का भला किया है लोक के माल पर मजे छानता तंत्र लगता है कि एक सेवक न होकर सम्राट नजर आता है। जो हम भोले-भाले नागरिक, गांव, गली, गरीब, पीडि़त, वंचितों के लिये दर्दनाक भी है और शर्मनाक भी।
राजसत्ता के संरक्षण में मजे उड़ाता तंत्र, सेवा छोड़ अधिकार, हको के लिये लड़ रहा है व व्यवस्थागत ढांचा अब रैंग रहा है। बेहतर हो कि राज्य के विद्या, विद्यवान, प्रतिभायें इस दुव्र्यवस्था पर विचार कर निदान दे। बरना अराजक होती व्यवस्था न तो राज्य, नागरिक और न ही उन स्वार्थवत सत्ताओं के हित में है न ही सृजन और कल्याण के हित में, जिसकी अपेक्षा आम पीडि़त, वंचित, गांव, गरीब, किसान और आम नागरिक को है।

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