क्या भाजपा को सत्ता तक पहुंचाने में मुकुल राय की रहेगी अहम भूमिका

कोलकाता : कभी थे तृणमूल के चाणक्य अब बने भाजपा के तारणहार मंथन न्यूज़ - पश्चिम बंगाल में माकपा के 34 वर्षों के लाल दुर्ग को ढाहने वाली तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल के राजनीतिक सत्ता तक पहुंचाने में मुकुल राय की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती रही है. पश्चिम बंगाल की राजनीति में मुकुल राय की गणना तृणमूल कांग्रेस के चाणक्य के रूप में की जाती है. 
श्री राय को ममता बनर्जी की लोकप्रियता को हथियार बना कर माकपा के मुकाबले राज्य के प्रत्येक मतदान केंद्र पर अपना संगठन व कैडर तैयार करने का श्रेय जाता है और इसी के बदौलत राज्य की सत्ता पर तृणमूल कांग्रेस काबिज हुई. 
कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अति विश्वस्त माने जाने वाले श्री राय और सुश्री बनर्जी के बीच 2016 के विधानसभा चुनाव के पहले ही दूरियां बढ़ने लगी थीं. सारधा चिटफंड घोटाले से उनके नाम जुड़ने, नारद कांड में संलिप्तता के आरोप और पार्टी में उनकी जगह मुख्यमंत्री के भतीजे व सांसद अभिषेक बनर्जी को दूसरा स्थान देने जैसे मुद्दों ने मुकुल और ममता के बीच दूरियां बढ़ा दीं और अंतत: श्री राय नेे भाजपा का दामन थाम लिया. 
विधानसभा चुनाव में हुए पराजित, बने राज्यसभा सांसद 
2001 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वह जगद्दल से तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार बने, लेकिन 56,741 के साथ दूसरे स्थान पर थे. हालांकि 2001 के विधानसभा चुनाव में वो खुद चुनाव हार गये, लेकिन तृणमूल कांग्रेस 60 सीट जीतने में कामयाब रही. 2006 में हुए राज्यसभा चुनाव में पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया. 2008 में उन्हें पार्टी का अखिल भारतीय महासचिव बनाया गया. 
2008 में वाममोरचा ने न्यूक्लियर डील पर तकरार के चलते कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए से समर्थन वापस ले लिया था. ऐसे में कांग्रेस को सूबे में नये साझीदार की जरूरत थी. 2009 में दोनों दलों में गठबंधन हो गया. तृणमूल ने इस चुनाव में 19 सीट जीतने में कामयाबी हासिल की. इसी दम पर मुकुल राय को केंद्र सरकार में जहाजरानी का राज्यमंत्री बनाया गया. 
ममता के बदले बने रेल मंत्री, दिनेश त्रिवेदी को लेकर तकरार
2011 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की जीत के बाद ममता बनर्जी बतौर मुख्यमंत्री बंगाल लौट गयीं. उन्होंने रेल मंत्री का पद अपने सबसे विश्वस्त सिपहसालार मुकुल राय को सौंपा. उन्हें रेल राज्यमंत्री का नया कार्यभार सौंपा गया. 
मुकुल राय इस पद पर लंबे समय तक टिक नहीं पाये. 11 जुलाई 2011. गुवाहाटी-पुरी एक्सप्रेस असम में पटरी से उतर गयी. तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने रेल मंत्री मुकुल राय को निर्देश दिया कि वो घटनास्थल का दौरा करें. श्री राय ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया. अगले ही दिन हुए कैबिनेट विस्तार में उनसे रेल मंत्री का कार्यभार छीन लिया गया. 
उनकी जगह पर तृणमूल कांग्रेस के ही दिनेश त्रिवेदी को नया रेल मंत्री बनाया गया. मार्च 2012 में आये रेल बजट ने तृणमूल और सरकार के भीतर चल रही कलह को सतह पर ला दिया. ममता बनर्जी रेल बजट से पहले ही घोषणा कर चुकी थीं कि यात्री किराये में किसी भी तरह की बढ़ोतरी नहीं होगी. दिनेश त्रिवेदी ने रेल बजट में यात्री किराया बढ़ाकर ममता की नाफरमानी की. ममता बनर्जी ने दिनेश त्रिवेदी से पद वापस लेने में कोई कोताही नहीं बरती. 20 मार्च 2012 को मुकुल रॉय को फिर से रेल मंत्री की कुर्सी दी गयी. इस बीच सरकार और ममता के बीच तनाव काफी बढ़ गया. ममता ने 21 सितंबर 2012 कांग्रेस से गठबंधन तोड़ दिया.
ना सूबे में उनकी सरकार पर कोई ख़ास असर नहीं डालता था. 21 सितंबर 2012 को तृणमूल ने कांग्रेस के साथ गठबंधन तोड़ दिया. इस तरह मुकुल राय का बतौर रेल मंत्री कार्यकाल खत्म हुआ.
एक रेलवे कर्मचारी के बेटे के लिए यह सियासी सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा. पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के कांचरापाड़ा स्थित श्री राय का जन्म 17 अप्रैल 1954 को हुआ  था. ऋषि बंकिमचंद्र डिग्री कॉलेज में श्री राय ने रसायन शास्त्र में बीएससी की पढ़ाई की, लेकिन उनकी दिलचस्पी थी राजनीति में थी. वह कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई से जुड़ गये. इसी रास्ते से युवा कांग्रेस में पहुंचे. 1995 में इनका संपर्क हुआ ममता बनर्जी के साथ हुआ और वह उनके संसदीय क्षेत्र में संगठन का काम करने लगे. 
1997 में बनी तृणमूल कांग्रेस में वो नंबर दो की पोजीशन पर थे और जल्द ही वह नयी दिल्ली में पार्टी का चेहरा बन गये और 2006 में उन्हें महासचिव बनाया गया.
इस तरह ममता-मुकुल के बीच बढ़ने लगी दूरी 
2011 में जब ममता बनर्जी बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं तो पार्टी की सारी कमान मुकुल राय के हाथ में आ गयी. वो सूबे में नंबर दो थे. सत्ता के गलियारों में उनकी धमक साफ सुनी जा सकती थी. 
स्थितियां बदलीं 2015 में. विधानसभा चुनाव में महज साल भर का समय बाकी था और सरकार के कई मंत्री सारधा चिटफंड घोटाले में घिर गये. सीबीआई जांच की तलवार पार्टी के नेताओं पर लटकने लगी.
मुकुल राय का नाम भी इस घोटाले में आ रहा था. सरकार सारदा चिटफंड से उबर ही रही थी कि नारदा स्टिंग ने एक बार फिर से तृणमूल सरकार के दौरान हुए भ्रष्टाचार को लोगों को सामने रख दिया. मुकुल राय एक बार फिर से आरोपों के घेरे में थे. इस बीच राजनैतिक गलियारों में खबर उठी कि मुकुल राय तृणमूल के कुछ नेताओं के साथ नई पार्टी बनाने की फिराक में हैं. 
विधानसभा चुनाव सिर पर था. ममता बनर्जी कोई रिस्क नहीं लेना चाह रही थीं. फिर मुकल राय पर भ्रष्टाचार के आरोप भी थे. ममता बनर्जी ने उन्हें पार्टी महासचिव के पद से हटाने में देरी नहीं लगायी और संगठन की कमान अपने हाथ में ले ली. 2016 में ममता और मुकुल के बीच चल रही तकरार कुछ सुलझती हुई नजर आई. 
मुकुल राय को फिर से संगठन में लाया गया. उनके लिए उपाध्यक्ष का नया पद बनाया गया लेकिन वो भरोसा फिर से कभी कायम नहीं हो पाया. पिछले कई महीने से अफवाह बार-बार उठ रही थी कि मुकुल राय तृणमूल छोड़कर बीजेपी ज्वॉइन कर लेंगे. ममता बनर्जी भी इससे बेखबर नहीं थीं. चार सितंबर को उन्होंने मुकल रॉय को संसदीय सलाहकार कमेटी से हटा दिया दिया. 
17 सितंबर को ममता ने पार्टी में उपाध्यक्ष के पद को खत्म कर दिया. इस तरह बिना इस्तीफा दिए मुकुल राय की तृणमूल कांग्रेस के संगठन से विदाई हो गयी.  अंतत: उन्होंने  25 सितंबर, 2017 को तृणमूल कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया, बाद में उन्हें  पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए छह साल के लिए पार्टी का निलंबित कर दिया  गया. 
उन पर केंद्रीय वित्त  मंत्री अरुण जेटली और भाजपा के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय जैसे भाजपा  नेताओं से मुलाकात के आरोप लगे. उन्होंने 11 अक्तूबर, 2017 को राज्य सभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. आखिरकार 3 नवंबर को मुकुल राय ने दिल्ली में बीजेपी की सदस्यता ग्रहण कर ली