प्रतिभा संरक्षण और समान अवसर, हमारा उत्तरदायित्व, जबाबदेही कर्तव्य विमुख व्यवस्था व्यक्ति व समाज को घातक


व्ही.एस. भुल्ले     
विलेज टाइम्स समाचार सेवा 03 मई 2018
कहते है सृष्टि, सृजन, सन्तुलन, जबावदेही उत्तरदायित्व और कत्र्तव्यों का निष्ठा पूर्ण निर्वहन समुची सृष्टि को सुन्दर ही नहीं, समृद्ध, खुशहाल भी बनाते हैं। वहीं चिन्तन, कर्तव्य विमुख व्यवस्था जीव, जगत, मानव, परिवार, समाज को कष्टप्रद संघर्षपूर्ण बनाती हैं। जो किसी भी सुस्कृत सभ्य समाज, जीव, जगत या  व्यवस्था के लिए घातक हैं।
          अगर हम समय परिस्थिति अनुसार स्वच्छ भाव से आज की स्थितियों और समस्याओं पर चिन्तन करें, तो लगभग आज हम उसी दिशा की ओर अग्रसर है जिसे सृष्टि, सृजन, समृद्धि, खुशहाली के लिए सर्वथा निशिद्ध माना गया है। हमें इसमें कतई संदेह नहीं होना चाहिए कि हमारी विरासत कभी दिव्य भव्य ही नहीं, बल्कि वैभव, गौरवशाली भी रही है। हमारे पूर्वजों ने हमें सर्वोत्तम शिक्षा, संस्कृति, संस्कार के समाज और व्यवस्था में कर्तव्य, जबावदेही उत्तरदायित्वों के एक से बढ़कर एक कीर्तिमान स्थापित किये है। जिनके संरक्षण में अनादिकाल से हमारी प्रतिभायें अपने पुरूषार्थ, सामर्थ के बल पर स्वर्णयम इतिहास रचती रही है और इस महान भू-भाग तथा यहाँ के नागरिकों का गौरव बढ़ाने के साथ उन्हें गौरवान्ति करने का महान कार्य किया हे।
          मगर आज सही चिन्तन, अर्थ और अवसरों के अभाव में, जिस तरह से हमारी प्रतिभायें दिगभ्रमित हो चिन्तन विमुख हुई है। सदभाव के अभाव में जिस तरह से स्वार्थ ने पैठ बनाई है, उसने समुचे समाज ही नहीं, हमारी व्यवस्था और चिन्तन को विकृत करने का ही कार्य किया है।
ऐसे में आज समुची जबावदेही उन विधा, विद्ववान प्रतिभाओं पर है, जिनकी आस्था सृष्टि सृजन और कल्याण में है जो समस्त जीव जगत, प्रकृति, मानव, जाति का जीवन समृद्ध , खुशहाल देखना चाहते है। निसंदेह आज उन्हें आगे आकर यह चुनौती और स्वयं की अपनी जबावदेही स्वीकारना होगी और उत्तरदायित्व के साथ पूर्ण निष्ठा ईमानदारी से सृष्टि कल्याण के लिये अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना होगा और यह तभी संभव है जब हम अपने निहित स्वार्थो को त्याग स्वयं, व्यक्ति, परिवार, समाज के लिये न सही कम से कम अपनी आने वाली पीड़ी अपने बच्चों के संरक्षण सम्बर्धन के साथ उनके बेहतर जीवन के लिये अपने विधा, विद्ववान ग्रन्थों के मार्गदर्शन में ऐसी व्यवस्था, व्यक्ति, परिवार, समाज में ऐसे संस्कारों का निर्माण करना होगा, जो सर्व कल्याणकारी हो, जिसके लिये हम आज मानव जीवन में है।
       अगर आज भी हम नवनिर्मित होती कुव्यवस्था, कुचिन्तन से संघर्ष के लिए स्वयं को तैयार नहीं कर सके, तो निश्चित ही हमारी वर्तमान पीढ़ी इतिहास में अवश्य ही दोष सिद्ध साबित होगी तब की स्थिति में अपराधी भी हम होगें और उपहास का पात्र भी हमी होगें। जो कभी न तो सुखद सफल कहा जायेगा न ही उसे सृष्टि कल्याण में मानव होने के नाते हमारा योगदान ठहराया जायेगा।