बैवस लोकतंत्र में, मूल्य, चरित्र का संकट आस्था, दिशाविहीन भीड़, डर का कारण

मंथन ऩ्यूज शिवपुरी
व्ही.एस.भुल्ले
जब कोई भी सभ्य समाज अपने सामने धूर्तता अनैतिकता, बेइमानी, नीचता को सफल, सक्षम, सार्थक होते देखता है तो वह सभ्य समाज, सहम जाता है। ऐसे में उसके आगे सबसे बड़ा संकट अपनी कोमल, किशोर पीढ़ी को लेकर यह होता है कि वह ऐसे में बाजार से लेकर शिक्षा के मन्दिरों, धार्मिक स्थलों तक और राजनीति से लेकर सत्ता, सिंहासन तक किस पर आस्था जमाये किसके पद चिन्हों पर चले और किन मूल्यों को वह माने।
            कहते है कि आस्था, दिशा, चरित्र, मूल्यहीन, बेकार युवकोंं की भीड़ खतरनाक होती है जो किसी मानव मूल्यों, राष्ट्रीयता या फिर व्यवस्था या फिर हमारा महान लोकतंत्र ही क्यों न हो उसका नाश करने काफी है। जैसा कि कभी हरिशंकर परसाई व समाज शास्त्री दीपक मेहता ने भी अपने लेखो में व्यक्त किया है ऐसे में हमारी चिन्ता तब और बढ़ जाती जब 1 अरब 30 करोड़ की आबादी वाले देश के सर्वोच्च पद पर बैठे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी व देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भीड़ के उन्माद पर अपनी-अपनी चिन्तायें, खेद और आक्रोश व्यक्त कर चुके हो।
          ऐसे में समझने वाली बात यह है अब हमें बगैर देर किये निर्धारित व्यवस्था को सरंक्षित कर उस विधान कानून कत्र्तव्य उत्तरदायित्वों का पूरी निष्ठा ईमानदारी से निर्वहन करते हुये लक्ष्य की ओर बढऩा पड़ेगा। जो समाज व राष्ट्र के निर्माण में सफल व सक्षम साबित हो। सम्भव है इस मार्ग में कंटक हमें हमारे अपने ही नजर आये, मगर पीछे हटने के बजाये हमें हमारे संविधान कानून अनुरुप आगे बढऩा ही पड़ेगा। अगर आज भी हम मानवीय सभ्यता उसके मूल्य चरित्र को संरक्षित संर्बधित नहीं कर पाये तो हमें यह सुनिश्चित मान लेना चाहिए कि आने वाले समय में न तो हम, न ही हमारे कौमल, किशोर और भविष्य न ही हमारा महान लोकतंत्र सुरक्षित रह पायेगा।
             बेहतर हो कि हम हमारी महान सभ्यता, संस्कृति, स्थापित मानवीय मूल्य चरित्र और आर्दश अनुसार समाज व राष्ट्र सुधार की दिशा में अपना योगदान दें व संवैधानिक संस्थाओं को वह मजबूती प्रदान करे जिससे हम पुन: सम्पन्न, खुशहाल और महान राष्ट्र बन सके, न कि एक हताश निराश बेकार उन्मादी भीड़ का अंग जिससे सिवाय विनाश के कभी भी कुछ हासिल होने वाला नहीं।