मंथन --परीक्षाओं के बाद नतीजों के दिन यानी हमारे बच्चों के लिए तनाव के दिन। प्रतिस्पर्धा के इस दौर में जब अंकों को ही प्रतिभा का पैमाना मान लिया गया हो, कम अंकों का तनाव कभी-कभी खुदकुशी के रूप में भी सामने आता है। इस कठिन वक्त में किसी बच्चे की जीवन की डोर न टूटे इस मकसद से नईदुनिया/नवदुनिया एक बार फिर सामाजिक सरोकार निभाते हुए अपनी इस खास सीरीज में बच्चों और अभिभावकों की मन की बात कहती चिट्ठियां प्रकाशित कर रहा है ताकि इन कठिन दिनों में महौल खुशनुमा बना रहे और बच्चें उम्मीद का दामन थामे रहें। आज पढ़िए बालोद जिले के दल्ली राजहरा में रहने वाले सुरेश गुप्ता का बेटी के नाम पत्र।
प्यारी बिटिया खुशी,
तुम्हारा रिजल्ट लेने तुम्हारे साथ मैं भी स्कूल गया। क्लास में 5वीं रैंक आने पर तुम्हारी निराशा को मैंने बहुत करीब से महसूस किया। घर से निकलते समय रिजल्ट जानने की जो खुशी मैनें तुम्हारे अंदर महसूस की वो पहली रैंक नहीं आने पर पल भर में ही गम में कैसे बदल गई मैं खुद सोचने पर मजबूर हो गया। तुम्हारा उदास चेहरा, झुके हुए कंधे,अपने आप पर तुम्हारा भरोसा एक क्षण में अविश्वास में बदल गया।
तुम मुझसे नजरें झुकाकर बातें करने लगीं। अपने आप को कोसने लगीं,पापा मैं अपने आप को क्या सजा दूं यह कहने लगी। तुम ऐसा क्यों सोचती हो कि पहली रैंक ना आकर तुमने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया है। एक पल के लिए मैं भी सदमे में आ गया और आज-कल की युवा पीढ़ी की तत्काल हर चीज को पा लेने की चाहत पर आश्चर्यचकित रह गया।
बेटा तुमने ऐसा कैसे सोच लिया कि पहली रैंक आने पर ही तुम पापा की आंखों का तारा बनी रहोगी, मैनें तो सिर्फ तुमसे अपनी पूरी क्षमता और पूरे मनोयोग से प्रश्नपत्र हल करने को कहा था। ना की पहली रैंक आने के लिए। तो तुमने ऐसा क्यों सोच लिया की पहली रैंक न आने पर पापा तुमसे नाराज हो जाएंगे और तुम फूट-फूट कर रोने लगी और रास्ते भर रोते ही रही। मैं मानता हूं बेटा कि जब हमारी उम्मीदें पूरी नहीं होती तो बहुत दुख होता है। खासकर जब बात पूरे साल की मेहनत की हो।
लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं कि उस क्लास की पढ़ाई खत्म होने पर दुनिया ही खत्म हो गई। ये कोई जंग का मैदान थोड़े ही है कि चार रैंक कम आ जाने पर दुश्मन जीत गया और तुम हार गईं। अभी तो तुम्हे जिंदगी की ऐसी ना जाने कितनी जंग लड़नी है। बेटा जिंदगी जब पल-पल तुम्हारा इम्तिहान लेगी तो हर पल गिरकर तुम्हें पहले से दोगुनी ताकत से फिर खड़ा होना होगा। ये कागज का छोटा सा टुकड़ा तुम्हारी जिंदगी, तुम्हारी शख्सियत का फैसला नहीं कर सकता।
तो अंत में सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा अपनी गलतियों पर ध्यान देते हुए अपनी कमजोरियों पर फोकस करते हुए एक तय टाइम टेबल से सिर्फ अपने लक्ष्य पर अर्जुन की तरह नजर रखते हुए फिर से प्रयास करो। देखो तुम्हें तुम्हारा मनचाहा रिजल्ट कैसे नहीं मिलता। और एक चीज हमेशा याद रखो कि एक असफलता से जिंदगी खत्म नहीं होती।

- तुम्हारा पापा-सुरेश गुप्ता
इनसे सीखें जीना : मंदिर में भोजन कर गुजारा करते थे स्टीव जॉब्स
स्टीव जॉब्स वह नाम है जिसने सूचना तकनीक की दुनिया ही बदल दी। लेकिन मोबाइल और कम्प्यूटर की दुनिया के इस बेताज बादशाह का शुरुआती जीवन संघर्ष और कठनाईयों से भरा हुआ था। उनके मां-बाप ने उन्हें किसी और को गोद दे दिया था। पढाई के दौरान उनके पास रहने के लिए कमरा तक नहीं था और वो दोस्तों के घर पर फर्श पर सोते थे।
यहां तक की वो भोजन के लिए भी वो एक कृष्ण मंदिर पर निर्भर थे। उन्होंने अपना कॉलेज भी बीच में ही छोड़ दिया था। एक समय तो ऐसा भी आया जब उन्हें अपनी खुद की कंपनी से ही निकाल दिया गया। लेकिन अपने निरंतर प्रयासों से उन्होंने अपने सपने को साकार किया और दुनिया की सबसे सफल मोबाइल और कम्प्यूटर कंपनी में से एक ऐपल के संस्थापक बन गए

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