भोपाल को ए -माइनस क्रेडिट रेटिंग मिली है, जबकि इंदौर को ए- प्लस। इस क्रेडिट रेटिंग की दौड़ में सबसे अच्छी स्थिति पुणे और नवी मुबंई जैसे शहरों की है, जिन्हें डबल ए प्लस क्रेडिट रेटिंग मिली है। यह रेटिंग दुनिया में क्रेडिट का आंकलन करने वाली फिच एजेंसी ने की है। शहरी विकास मंत्रालय की कोशिश है कि चयनित स्मार्ट सिटी शहरों में बांड, बैंक और निजी कंपनियों से कर्ज के जरिए निवेश हासिल किया जाए। स्मार्ट सिटी की गाइडलाइन में भी इसका प्रावधान है।
यह हैं रेटिंग के मायने और फायद
जिस भी शहर की रेटिंग बेहतर है, वह निवेश के लिए सुरक्षित माना जाता है। यानी कि निवेशकों की रकम डूबने की नौबत नहीं आएगी। इस वजह से यहां ज्यादा निवेशक आते हैं। जोखिम कम होने का फायदा शहर उठाते हैं और वे सस्ता कर्ज हासिल कर लेते हैं। जबकि जोखिम वाले शहरों में निवेशक तभी तैयार होते हैं जबकि उन्हें ज्यादा मुनाफा मिले। मतलब ऐसे शहरों को महंगा कर्ज मिलेगा।
इन शहरों की तय होनी है क्रेडिट रेटिंग
मंत्रालय की योजना के तहत मध्यप्रदेश के जिन शहरों की क्रेडिट रेटिंग तय होनी है,उनमें सात स्मार्ट सिटी वाले शहर हैं। अभी उज्जैन, जबलपुर, ग्वालियर, सागर और सतना में क्रेडिट रेटिंग होना बाकी है।
क्रेडिट रेटिंग का फार्मूला बैंकिंग की तरह
शहरों की क्रेडिट रेटिंग तय करने का फॉर्मूला ठीक बैंकों द्वारा जारी किए जाने वाले लोन या क्रेडिट कार्ड की तरह है। यानी आपकी माली हालत के आधार पर ही यह रेटिंग तय की जाती है।
निवेशकों की पसंद ट्रिपल ए या डबल ए रेटिंग वाले शहर
सूत्रों की मानें तो स्मार्ट और अमृत शहरों में फिलहाल निवेशकों की पसंद सिर्फ ऐसे शहर हैं, जिनकी क्रेडिट रेटिंग ट्रिपल ए, डबल ए या फिर ए-प्लस है। मंत्रालय की कोशिश है कि जो शहर रेटिंग में पिछड़ रहे हैं, उन्हें रेटिंग में लाया जाए।
पूनम पुरोहित 
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