सही सुझाव पर बेजा तर्क

मंथन न्यूज भोपाल यह घोर निराशाजनक है कि निर्वाचन आयुक्त की ओर से यह कहते ही विपक्षी दलों ने बिना सोचे-विचारे उन पर निशाना साधना शुरू कर दिया कि निर्वाचन आयोग अगले साल तक लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने में सक्षम हो जाएगा। चूंकि एक अर्से से यह चर्चा चल रही है कि आखिर दोनों चुनाव एक साथ क्यों नहीं हो सकते इसलिए एक सवाल के जवाब में निर्वाचन आयुक्त ने आयोग की क्षमता से अवगत कराने भर का काम किया। जब जरूरत इसकी थी कि राजनीतिक दल एक साथ चुनाव कराने के सर्वथा उचित सुझाव पर नीर-क्षीर ढंग से विचार करते और अपनी सहमति-असहमति तार्किक तरीके से व्यक्त करते तब उनकी ओर से कुतर्क पेश करने शुरू कर दिए गए। जहां भाकपा नेता ने निर्वाचन आयोग पर सरकार की भाषा बोलने का बेतुका आरोप मढ़ा वहीं नई तरह की राजनीति का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी के नेता ने यह विचित्र बात कही कि एक साथ चुनाव होने से देश की विविधता खत्म हो जाएगी। ऐसे कुतर्क देने वालों को यह याद होना चाहिए कि 1967 के पहले लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ ही होते थे। आखिर जब उस समय किसी ने विविधता पर असर पड़ने का सवाल नहीं उठाया तो अब क्यों उठाया जा रहा है? एक सही सुझाव के विरोध में अजीबोगरीब बयान दे रहे दलों को इस बुनियादी तथ्य से भी अवगत होना चाहिए कि यह फैसला करने का अधिकार निर्वाचन आयोग को नहीं है कि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ हों या नहीं? ऐसा कोई फैसला तो राजनीतिक दलों की सहमति से सरकार ही ले सकती है।
बेहतर होगा कि सभी राजनीतिक दल संकीर्ण स्वार्थ परे रखकर यह देखें कि एक साथ चुनाव होने में समाज और देश के साथ खुद उनका भी हित है। वर्तमान में करीब-करीब हर वर्ष किसी न किसी राज्य के विधानसभा चुनाव होते ही रहते हैैं। कभी-कभी तो एक वर्ष में ही अलग-अलग समय कई विधानसभाओं के चुनाव होते हैैं। इसी साल प्रारंभ में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब आदि में चुनाव हुए और अब हिमाचल एवं गुजरात में होने वाले हैैं। जब ऐसा होता है तो एक ओर जहां आचार संहिता के चलते शासन के काम ठप हो जाते हैैं वहीं दूसरी ओर राजनीतिक दलों को अपना सारा ध्यान चुनावों पर केंद्रित करना पड़ता है। बार-बार चुनाव होते रहने से समय और धन की भी अच्छी-खासी बर्बादी होती है। किसी भी राज्य में चुनाव हों उनके मद्देनजर संसद में राजनीतिक दलों का व्यवहार बदल जाता है और यह अक्सर उनकी अगंभीरता के रूप में ही नजर आता है। आखिर यह कहां की समझदारी है कि एक साथ चुनाव हो सकने के बावजूद वे अलग-अलग होते रहें और उसके चलते देश के संसाधन जाया होते रहें? वैसे तो इस दलील में ज्यादा दम नहीं कि एक साथ चुनाव होने से क्षेत्रीय दल घाटे में रहेंगे, लेकिन यदि उन्हें ऐसा ही लगता है तो कृपा करके कम से कम वे लोकसभा चुनाव होने के दो साल बाद समस्त विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने पर सहमत हों।