लोकतंत्र में जनधन से पोषित सत्ताओं का सच भय, भ्रम, धन, बल से पोषित सत्तायें कभी कल्याणकारी नहीं होती- व्ही.एस.भुल्ले

मंथन न्यूज शिवपूरी

सत्ता प्राप्त करने जिस तरह की राजनीति ने अब हमारे महान लोकतंत्र में जन्म लिया है जिस तरह के साधनों का भारतीय राजनीति में प्रार्दुभाव सत्ता के लिये हुआ है या हो रहा है इससे लोकतंत्र का स्वरुप संरक्षित रहेगा या स्वयं का अस्तित्व बचाने संघर्ष करेगा यह अलग बात है।
        मगर जिस तरह से सत्ता प्राप्ति के लिये नवरत्न बनते भय, भ्रम, धन, बल सत्ता के नगीने बनते जा रहे है। इससे सत्ता प्राप्ति का जुनून तो पूरा होता है और होता रहेगा मगर जन कल्याण कितना सम्भव होगा यह सुनिश्चित नहीं। मगर इतना स्पष्ट है कि जिन उद्देश्यों को लेकर हमने लोकतंत्र को अंगीकार किया। उनका छरण तो आजादी के कुछ दशकों बाद ही शुरु हो चुका था। मगर इसे जो गति 90 के दशक से मिली वह 2020 तक पूर्ण चमोत्कर्स पर होगी।
         क्योंकि दलों के नाम लोकतंत्र में जो गैंग प्रवृति पनप रही है फिर उसका आधार वैचारिक रहा हो या आपसी स्वार्थ उसने महान भारतीय जीवन मूल्य नीत, नियत, आचरण, चरित्र को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिये दर्दनाक भी है और शर्मनाक भी।
         देखा जाये तो जिस लोकतंत्र में चुनावों में खर्च की सीमा लाखों तक जा पहुंची हो और कर से इतर, कर बचाने की मंशा जहां फलती-फूलती हो और आधे से अधिक सस्ते राशन मुफत सुविधाओं के लिये मोहताज हो, वहां लाखों खर्च कर राष्ट्र सेवा, समाज सेवा की बात से बढ़कर और कोई बड़ा झूठ लोकतंत्र के नाम दूसरा नहीं हो सकता। 
         मगर सब कुछ विगत तीन दशकों से चल रहा है चुनावों में खर्च की सीमा कम रही हो, या ज्यादा। मगर व्यवस्था लगभग समान ही रही। आज चन्दों से पोषित राजनैतिक दलों का आचरण चुनावों के दौरान किसी कुबेर या याचना कत्र्ता से कम नहीं। लोकतंत्र में पनपते अघोषित सेवको का आचरण, व्यवहार आज किसी सम्राट, बादशाह, चक्रवर्ती सम्राट, राजा, जागीदारों से कम नहीं।
        फिर चाहे वह किसी भी दल में हो या फिर संवैधानिक संस्थाओं में कहीं से कही तक सेवा भाव नहीं झलकता। ऐसे में लोकतंत्र के अन्दर आशा-आकांक्षाओं का केन्द्र बने चुनावों में भय, भ्रम, धन, बल के प्रहार से कैसे जनकल्याण लोकतंत्र की छाती चीर निकलेगा। यह कहना मुश्किल ही नहीं नमुमकिन है क्योंकि अब राष्ट्र निर्माता ही कंगाल, पीडि़त, वंचित हो निढाल हो चले है और सत्ता तक का सफर मुश्किल ऐसे कैसे हम समृद्ध और कैसे हम खुशहाल बनेगें यह विचारणीय विषय हमारे सामने है।  
जय स्वराज