कमिश्नर ने साफ कहा कि यह वाहन कमर्शियल हैं



इंदौर मंथन न्युज-

व्यावसायिक उपयोग करने वाली बोरिंग मशीनों की सफेद नंबर प्लेट होने पर आयुक्त ने अतिरिक्त परिवहन आयुक्त को कार्रवाई के आदेश दिए हैं। विशेष तौर पर इंदौर में चलने वाली सभी बोरिंग मशीनों की जांच के लिए कहा गया है। इनके टैक्स की भी जांच होगी। साथ ही फिटनेस और परमिट भी देखा जाएगा। अवैध तरीके से चलने वाले वाहनों को आयुक्त ने जब्त करने के निर्देश दिए गए हैँ। 

परिवहन विभाग को हर महीने 6 लाख का नुकसान 

मोटरयान अधिनियम के प्रावधानों के मुताबिक व्यक्तिगत उपयोग में आने वाले वाहनों को नॉन ट्रांसपोर्ट श्रेणी में रजिस्टर्ड किया जाता है। इन वाहनों का व्यावसायिक उपयोग नहीं किया जा सकता है। केरल और तमिलनाडू में रजिस्टर्ड 250 से ज्यादा बोरिंग मशीनें नॉन ट्रांसपोर्ट श्रेणी में रजिस्टर्ड हैं। इनकी नंबर प्लेट सफेद है। जबकि इनका उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों में हो रहा है। दूसरे प्रदेशों से आकर मप्र में चलने वाले वाले नॉन ट्रांसपोर्ट वाहनों को यूएलडब्ल्यू (खाली वाहन) के मुताबिक मंथली रोड टैक्स चुकाना होता है। वहीं कमर्शियल उपयोग वाले वाहनों को आरएलडब्ल्यू (भरे हुए वाहन) टैक्स चुकाना होता है। बोरिंग वाले वाहनों में भारी-भरकम मशीनें लगी होती हैं। इनका वजन भी अधिक होता है। कायदे से इनसे आरएलडब्ल्यू के मुताबिक टैक्स लिया जाना चाहिए। लेकिन सफेद नंबर प्लेट होने से इनसे यूएलडब्ल्यू के मुताबिक टैक्स लिया जाता है। आरएलडब्ल्यू के मान से एक बोरिंग मशीन पर महीने में करीब 4500 रुपए टैक्स बनता है। वहीं यूएलडब्ल्यू के मुताबिक करीब 2100 रुपए टैक्स बनता है। नॉन ट्रांसपोर्ट श्रेणी का फायदा उठाकर बोरिंग वाले वाहन यूएलडब्ल्यू के मान से 2100 रुपए टैक्स चुकाते हैं। यह 2100 रुपए भी प्रदेश में आने के दौरान ही चुकाए जाते हैं। इसके बाद जब कभी उड़नदस्ता इनकी जांच करता है तो एजेंट को फोन कर एक महीने की रसीद कटवा देते हैं। अनुमान के मुताबिक अकेले इंदौर में ही दूसरे प्रदेशों की करीब 250 बोरिंग मशीनें हैं। आरएलडब्ल्यू और यूएलडब्ल्यू के बीच 2400 रुपए के अंतर के हिसाब से भी आकलन किया जाए तो परिवहन विभाग को हर महीने करीब 6 लाख रुपए का नुकसान हो रहा है। 

इन तीन जगहों पर खड़ी होती हैं 250 बोरिंग मशीनें 

केरल और तमिलनाडू से आई सफेद नंबर प्लेट वाली 250 बोरिंग मशीनें इंदौर में तीन जगहों पर खड़ी होती हैं। लसूिड़या स्थित एसआर कंपाउंड की लगभग हर गली में यह गाड़ियां पार्क होती हैं। यहीं के एमएस गैरेज में भी कई गाड़ियां खड़ी रहती हैं। पालदा स्थित उद्योग नगर में सन्मुख गैरेज और इसके आसपास की सड़कों पर भी यह गाड़ियां खड़ी होती हैं। कनाड़िया रोड पर पाटीदार पेट्रोल पंप के आसपास इन गाड़ियों का तीसरा ठिकाना है। ज्यादातर गाड़ियां इन्हीं जगहों पर ही खड़ी होती हैं। डीबी स्टार के पास इनके फोटो हैं। बावजूद इसके परिवहन विभाग के उड़नदस्ते के यह गाड़ियां दिखाई नहीं देती हैं। 

इंदौर डीबी स्टार 

व्यावसायिक उपयोग करने वाली बोरिंग मशीनों की सफेद नंबर प्लेट होने पर आयुक्त ने अतिरिक्त परिवहन आयुक्त को कार्रवाई के आदेश दिए हैं। विशेष तौर पर इंदौर में चलने वाली सभी बोरिंग मशीनों की जांच के लिए कहा गया है। इनके टैक्स की भी जांच होगी। साथ ही फिटनेस और परमिट भी देखा जाएगा। अवैध तरीके से चलने वाले वाहनों को आयुक्त ने जब्त करने के निर्देश दिए गए हैँ। 

परिवहन विभाग को हर महीने 6 लाख का नुकसान 

मोटरयान अधिनियम के प्रावधानों के मुताबिक व्यक्तिगत उपयोग में आने वाले वाहनों को नॉन ट्रांसपोर्ट श्रेणी में रजिस्टर्ड किया जाता है। इन वाहनों का व्यावसायिक उपयोग नहीं किया जा सकता है। केरल और तमिलनाडू में रजिस्टर्ड 250 से ज्यादा बोरिंग मशीनें नॉन ट्रांसपोर्ट श्रेणी में रजिस्टर्ड हैं। इनकी नंबर प्लेट सफेद है। जबकि इनका उपयोग व्यावसायिक गतिविधियों में हो रहा है। दूसरे प्रदेशों से आकर मप्र में चलने वाले वाले नॉन ट्रांसपोर्ट वाहनों को यूएलडब्ल्यू (खाली वाहन) के मुताबिक मंथली रोड टैक्स चुकाना होता है। वहीं कमर्शियल उपयोग वाले वाहनों को आरएलडब्ल्यू (भरे हुए वाहन) टैक्स चुकाना होता है। बोरिंग वाले वाहनों में भारी-भरकम मशीनें लगी होती हैं। इनका वजन भी अधिक होता है। कायदे से इनसे आरएलडब्ल्यू के मुताबिक टैक्स लिया जाना चाहिए। लेकिन सफेद नंबर प्लेट होने से इनसे यूएलडब्ल्यू के मुताबिक टैक्स लिया जाता है। आरएलडब्ल्यू के मान से एक बोरिंग मशीन पर महीने में करीब 4500 रुपए टैक्स बनता है। वहीं यूएलडब्ल्यू के मुताबिक करीब 2100 रुपए टैक्स बनता है। नॉन ट्रांसपोर्ट श्रेणी का फायदा उठाकर बोरिंग वाले वाहन यूएलडब्ल्यू के मान से 2100 रुपए टैक्स चुकाते हैं। यह 2100 रुपए भी प्रदेश में आने के दौरान ही चुकाए जाते हैं। इसके बाद जब कभी उड़नदस्ता इनकी जांच करता है तो एजेंट को फोन कर एक महीने की रसीद कटवा देते हैं। अनुमान के मुताबिक अकेले इंदौर में ही दूसरे प्रदेशों की करीब 250 बोरिंग मशीनें हैं। आरएलडब्ल्यू और यूएलडब्ल्यू के बीच 2400 रुपए के अंतर के हिसाब से भी आकलन किया जाए तो परिवहन विभाग को हर महीने करीब 6 लाख रुपए का नुकसान हो रहा है।