क्या नरेंद्र मोदी संघ के 'मिशन 2025' को पूरा कर पाएंगे

is narendra modi complete sangh mission 2025पूनम पुरोहित मंथन न्यूज़ -कहते हैं कि जंग में अपने दुश्मन और राजनीति में अपने विरोधी को कभी कम नहीं आंकना चाहिए, पर अमूमन ऐसा होता नहीं।
लोग बार-बार ये गलती करते ही हैं।  जनसंघ  (भाजपा के पुराने अवतार) के जमाने में कांग्रेस के लोग एक नारा लगाते थे- 'इस दीपक में तेल नहीं सरकार चलाना खेल नहीं।'

वो जमाना कांग्रेस के वर्चस्व का था। दिल्ली से दक्षिण, उत्तर, पश्चिम और पूरब में कांग्रेस की दुन्दुभि बजती थी। समय ने करवट ली है।

जिस पार्टी पर तंज किया जाता था कि उसे सरकार चलाना नहीं आता, वह देश के बीस राज्यों और केंद्र में अकेले या सहयोगियों के साथ सत्ता में है।

और यह तंज करने वाली पार्टी आज पांच राज्यों में सिमट गई है। कुछ दिनों में यह संख्या और घट सकती है।

इस बदलाव के यूं तो कई कारण हैं पर एक बड़ा कारण यह है कि पिछले कुछ दशकों में कांग्रेस ने अवसर गंवाए हैं और भाजपा ने चुनौती को अवसर में तब्दील किया है।

शनिवार को जिन तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजे आए उनसे भी इस बात को समझा जा सकता है।

त्रिपुरा में माणिक सरकार की लोकप्रियता में कमी किसी से छिपी नहीं थी। ईमानदार मुख्यमंत्री होने के बावजूद एक बेईमान सरकार से त्रिपुरा के लोग आजिज आ गए थे।

भाजपा से पहले कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के पास इस सत्ता विरोधी रुझान को भुनाने का मौका था।

कांग्रेस विधायकों को समझ में आ गया था कि त्रिपुरा की हवा मार्क्सवादी सरकार के खिलाफ बह रही है।

पश्चिम बंगाल में ममता के प्रचंड उभार को देखकर उन्हें लगा कि ममता एक और राज्य में सत्ता चाहेंगी, इसलिए वे पहले तृणमूल के साथ गए।

पर राष्ट्रीय पार्टी से आई ममता बनर्जी की सोच क्षेत्रीय दलों वाली निकली। वे अपने किले से बाहर आने के लिए तैयार नहीं हुईं।

राज्य में सरकार विरोधियों के लिए एकमात्र विकल्प भाजपा बची थी। भाजपा इस मौके के लिए पिछले चार साल से तैयारी कर रही थी। 

नतीजा ये हुआ कि डेढ़ फीसदी वोट वाली पार्टी पांच साल में 42 फीसदी पर पहुंच गई।

त्रिपुरा और नगालैंड (जूनियर पार्टनर के रूप में) की जीत के बाद भाजपा पूर्वोत्तर में लगभग उस स्थिति में आ गई है जहां करीब चार दशक पहले कांग्रेस हुआ करती थी।

बीजेपी ने ये छलांग पिछले चार सालों में लगाई है। ये बात सही है कि लोकसभा चुनाव के नजरिए से देखें तो पूरे पूर्वोत्तर में लोकसभा की कुल पच्चीस ही सीटें हैं।

इसलिए ये जीत लोकसभा के अंक गणित को बहुत बड़े पैमाने पर बदल देगी ऐसा नहीं है। पर भाजपा संगठन और उसकी केंद्र सरकार के लिए इस जीत के बहुत मायने हैं।

पूर्वोत्तर में ऐसी पैठ से भाजपा के हिंदी पट्टी की पार्टी होने बिल्ला हट गया है। दूसरे, त्रिपुरा की जीत से पश्चिम बंगाल और केरल में पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ेगा।

त्रिपुरा में हारी तो मार्क्सवादी पार्टी है पर नुकसान सबसे ज्यादा कांग्रेस को हुआ है। वह भी राष्ट्रीय स्तर पर।

ये नुकसान वोट के लिहाज से नहीं बल्कि बौद्धिक पूंजी (इंटेलेक्चुअल कैपिटल) का होगा। वैचारिक बौद्धिक स्तर पर अब अंदरूनी संघर्ष और तेज होगा।

कांग्रेस को सबसे ज्यादा मदद वामपंथी बुद्धिजीवियों से मिलती थी।

माकपा के कमजोर होने से कांग्रेस को घाटा ज्यादा होगा क्योंकि कमजोर हालत में भी भाजपा को चुनौती देने वाली वह एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी है।

गुजरात विधानसभा चुनाव में अपेक्षा से खराब प्रदर्शन और राजस्थान में तीन उपचुनाव (दो लोकसभा और एक विधानसभा सीट) हारने के बाद राजनीतिक हलकों में एक चर्चा चल पड़ी थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा शासित तीन राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में सत्ता विरोधी रुझान से बचने के लिए समय से पहले लोकसभा चुनाव करा सकते हैं।

कयास लगाया जा रहा था कि इस साल के अंत तक लोकसभा  चुनाव हो सकते हैं।

इस बात को प्रधानमंत्री के बार-बार ये कहने से भी बल मिला कि लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ साथ कराने पर विचार किया जाना चाहिए।