विलेज टाइम्स समाचार सेवा। 19 मार्च 2018
जिस तरह से मात्र 70 वर्ष पुराने लोकतंत्र में नैतिक पतन सत्ता प्राप्ति की सीढ़ी और खुशहाल, समृद्ध जीवन की नजीर बन रहा है इसके चलते इस महान भू-भाग पर कुछ हो न हो मगर एक ऐसे इतिहास का निर्माण अवश्य हो रहा है। जो अपने आगोस में समेटे तीन-तीन पीढिय़ों को जीवन मूल्य, सिद्धान्तों की एक ऐसी विरासत साबित होगा जो नई संस्कृति के साथ ऐसे समाज, राज्य, राष्ट्र का निर्माण करेगा जिस पर कोई भी स य समाज या भारत वर्ष पर शेष बची पीढ़ी दुख भी व्यक्त करेगी और शर्म भी महसूस करेगी। ऐसे में मात्र एक ही रास्ता शेष बचता है जो सिर्फ स्वराज की ओर जाता है। क्योंकि सत्य स्व: प्रमाणिक होता है हर वर्ग व्यवस्था की अपनी प्रमाणिकता होती है। मगर स पूर्ण सत्य नहीं जब कभी भी किसी भी समाज, व्यवस्था में भ्रमवश भटकाव आता है तो ऐसा समाज और व्यवस्था सत्य के अभाव में स्वत: ही दिशाहीन हो जाते हैं।
जिस तरह से देश भर में उपचुनावों में भा•ा.पा को केन्द्रीय व राज्य सरकारों में संसद एवं विधान सभाओं के उपचुनाव में सिकस्त मिल रही है। इसकी प्रमाणिकता के चलते भ्रम भटकाव और दिशाहीन नीतियों के रूप में आना स्वभाविक है मगर ऐसे माहौल में राजधर्म के पालन में अग्रसर दल, सरकारों को विचलित होने की जरूरत नहीं क्योंकि किसी सरकार और सरकार प्रमुख का राजधर्म ही नही उसका कर्तव्य उत्तरदायित्व होता है कि वह जनकल्याण, सर्वकल्याण की ऐसी नीतियाँ बनाये जो स्पर्शी, पारदर्शी और परिणाम मूलक हो, जिनमें जीवन मूल्य, प्राकृतिक सिद्धान्तों का भाव हो, जिनकी प्रमाणिकता सत्य के नजदीक हो क्योंकि सत्य स्व: प्रमाणिक होता है। स्पर्शी होता है। इसलिए जन व राष्ट्र कल्याण के नाम नीतियाँ केवल सत्ताधारी दल, या सत्ता प्रमुख की संतुष्टी उसके अहंकार की पूर्ति के लिए अस्तित्व में नहीं आना चाहिए बल्कि उनका ध्येय सर्वकल्याण होना चाहिए। फिर वह नीति, राजकाज, समाज, या फिर अर्थ व्यवस्था, राज्य, राष्ट्र के लिए हो।
कुछ लोगों को प्रमाणिकता के अभाव में इसलिये भी अति प्रसन्न नहीं होना चाहिए क्योंकि जिन्हें पहले जनता प्रमाणिकता के अभाव में सत्ता से बाहर कर चुकी है। उन्हें जनता ने हार प्राप्त दलों के रूप में और सत्ताधारी दलों को भी यह स्पष्ट संदेश दिया है कि आपकी नीतियों में परिणाम और स्पर्शी भाव नही इसलिए जनकल्याण, राष्ट्रकल्याण से जुड़ी नीतियों का निर्माण, क्रियान्वयन ऐसा होना चाहिए कि जिन उद्देश्यों को लेकर दल सत्ता में होते हैं जिन उद्देश्यों को लेकर नीतियाँ गढ़ी जाती है वह जनकल्याणकारी, राष्ट्र कल्याणकारी हो और उनकी समीक्षा, मूल्यांकन, पारदर्शिता स्पष्ट व परिणाम मूलक हो।
क्योंकि जिस सत्ता में पारदर्शिता प्रमाणिकता और स्पर्शी भाव नहीं होता उसकी आयु बहुत कम होती है फिर वह लोकतंत्र में म.प्र., उ.प्र. बिहार की उपचुनावों में हार हो या इतिहास में बड़ी-बड़ी सत्ताओं का पतन यह समझने वाली बात है। जय स्वराज।

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