संपदा, संरक्षण सरकार की जबावदेही, सुरक्षा, संसाधनों के अभाव में दम तोड़ती प्रतिभायें

  FRIDAY 6 OCTOBER 2017 
व्ही.एस.भुल्ले 

सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान, कौशल, विद्या, विद्यवान, तकनीक, ऊर्जा और मानव कल्याण का अस्तित्व किसी भी राष्ट्र में उसके शासक, सरकार परिषद द्वारा प्रदत्त सुरक्षा, सरंक्षण, सम्वर्धन उनके मान-सम्मान, स्वाभिमान पर निर्भर करता है। और ऐसा करना राजसत्ता, परिषद, सरकार, शासक का धर्म भी होता है और उसका कर्म भी जो उसकी जबावदेही तय करते है। 
         अगर आज हमारे राष्ट्र में एक बार पुन: समृद्ध राष्ट्र निर्माण के लिये उथल-पुथल है तो यह महान भारतवर्ष के लोगों के लिये शुभसंकेत है। मगर हालिया सवाल जीएसटी गिरती जीडीपी और बढ़ती बेरोजगारी को लेकर है। 
              अगर यो कहे कि स्वराज से इतर तीनों ही अहम सवाल व्यर्थ है तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। क्योंकि सरकार का चेहरा बने मुखियाओं को देश की आवाम को समझाने, वोट बैंक बढ़ाने व अपने प्रतिद्विन्दयों को कोसने सबक सिखाने से फुरसत कहां और न ही उन्हें सूट-बूट से संरक्षित कानून, नीतियों को स्वराज के अनुरुप बनाने की जरुरत। अगर सरकारों के मुखियाओं की रोजाना दिनचर्या या कार्यक्रमों का अध्ययन किया जाये तो मालूम होगा कि इन्हें फुरसत ही कहां। सत्ता में आसीन होने के बाद न तो इनके पास राष्ट्र व मानव कल्याण की कोई सोच रह जाती है और न ही तत्कालीन परिस्थितियों के अध्ययन का समय। ऐसे में न ही इनके पास ऐसा कोई पारदर्शी, स्पर्शी रोड मेफ होता है जिसे देख यह समीक्षा कर सके कि क्या राष्ट्र व जनहित में और कैसे जीवन के लिये जटिल कानून और नीतियों को सरल बना राष्ट्र को समृद्ध और लोगों का जीवन खुशहाल बनाया जा सकता है। 
             बैसे भी किवदन्तियों में कहा जाता है कि शिक्षा और शिक्षक की गोद में वैभव, विनाश दोनों खेलते है और लोगों के खुशहाल जीवन का अस्तित्व प्रतिभाओं की सुरक्षा, संरक्षण, संवर्धन फिर वह सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक राजनैतिक, सांस्कृतिक प्राकृतिक क्षेत्र से ही जुड़ा, क्यों न हो? 
           आज बेरोजगारी बढ़ती मंहगाई और जीएसटी जैसी समस्यायें, देखा जाये तो कोई समस्या ही नहीं, अगर देश व प्रदेश की सरकारें और स्वयं प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार के सहयोगी शुभचिन्तकों ने उनके ही नारे पर पूर्ण निष्ठा ईमानदारी से कार्य किया होता तो आज केन्द्र सरकार को ही न तो अपने बहुमूल्य 3 वर्ष इस तरह गबाना पढ़ते, न ही आलोचनाओं का शिकार होना पढ़ता। मिनीमम गवरमेन्ट, मेग्जीमम गर्वनेन्स क्योंकि किसी भी सत्ता, शासक, सरकारों का अस्तित्व आवाम के अस्तित्व पर निर्भर होता है। 
              इसीलिये सत्ता शासक, सरकारों का कत्र्तव्य होता है कि उनके कानून और नीतियां कल्याणकारी हो, जब तक सत्ता, शासक, सरकारों की नीतियां और कानून कल्याणकारी नहीं होते तब इस तरह की समस्यायें लाख कोशिश कड़े संघर्ष के बावजूद यथावत वन समृद्ध खुशहाल राष्ट्र के मार्ग की बाधा बनती रहेगीं। 
            ये प्रधानमंत्री जी की महानता ही है कि उन्होंने सार्वजनिक मंच से स्वीकार किया कि यह नहीं मानते कि उनकी ही सरकार में प्रकांण्ठ विद्यवान है। मगर सही दिशा में कोशिश करना उनका काम है। इतना सबकुछ होने के बावजूद भी अक्षमता, असफलता का दंश र्दुभाग्य पूर्ण है। 
             काश देश के दल व राजनीति राष्ट्र व जन कल्याण के मुद्दें पर थोड़ी उदार और गैर जरुरी शासकीय कानून व्यवस्था में सुधार हो पाये तो कोई कारण नहीं जो बड़े से बड़े लक्ष्य को मात्र 1 वर्ष में ही हासिल न किया जा सके। भले ही प्रधानमंत्री जी मुद्रा कोष के आंकड़े 4 लाख के पार बताते हो मगर मुद्राकोष न तो पारदर्शी दिखा, न स्पर्शी कारण प्रमाणिकता की कमी और क्रियान्वयन में कोताही। अगर देश के प्रधानमंत्री जी को परिणाम चाहिए तो सरकार के कार्यो में सरलता, सहजता और प्रमाणिकता लाने के साथ सरकार में सहभागिता बढ़ानी होगी फिर वो व्यक्ति, संगठन या संस्थान हो।
           देखा जाये तो कर और रोजगार जीवन की गाड़ी के ऐसे दो पहिये होते है जिस पर किसी भी राष्ट्र की मजबूत अर्थव्यवस्था, राष्ट्र की समृद्धि निर्भर करती है। जब तक हम अपने राष्ट्र में कर और रोजगार स्पर्शी, पारदर्शी परिणाम मूलक बनाने उनके रास्तों को सुगम, सरल नही बना लेेते तब तक समस्यायें बनी रहेगी। और यह कार्य 1 वर्ष में ही अवश्य सार्थक सम्मान जनक तरीकों से किया जा सकता। जो प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली सरकार के लिये कोई असम्भव कार्य नहीं। जिससे देश की एक अरब से अधिक की आबादी तो लाभान्वित होगी ही, बल्कि करोड़ों लोगों को रोजगार भी मिलेगा और समुचा राष्ट्र समृद्धि, खुशहाली की अनुभूति कर पायेगा।