
मंथन न्यूज़ - गैर कांग्रेसी कहते हैं कि राहुल सिर्फ इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष बन गए क्योंकि वो सोनिया और राजीव गांधी के पुत्र हैं. सचिन पायलट, जितिन प्रसाद, दीपेंद्र हुड्डा या मिलिंद देवड़ा, ये सभी नाम ऐसे बताए जाते रहे हैं जिनको सरनेम के कारण कुर्सी मिली. पिछले दिनों खुद राहुल गांधी कह चुके हैं कि वंशवाद भारत में परंपरा है.
भारतीय राजनीति में ऐसा दौर लगातार दिख रहा है जब नेता लोग येन-केन-प्रकारेण कुर्सी से बिना फेवीकोल के ही चिपके रहते हैं. एक बार नेतागिरी चमक गई तो बेटे-पोतों की बैकडोर एंट्री आम है. लालू यादव जैसे लोग जब अपने नौवीं फेल बेटे को उपमुख्यमंत्री बना देते हों, तब राजस्थान में नई मिसाल देखने को मिली है. ऐसा उदाहरण, जो उदारीकरण के बाद विरले ही दिखा है.
जयपुर के पास जमवा रामगढ़ से बीजेपी विधायक जगदीश नारायण मीना के बेटे रामकृष्ण मीना चपरासी पद पर नियुक्त हुए हैं. ये तो वाकई अचंभे वाली बात हो गई. वो समय गया जब सरदार पटेल या लाल बहादुर शास्त्री जैसे नेता अपने बेटे-बेटियों के लिए ‘जुगाड़’ नहीं करते थे. पिछले कुछ साल में तो यही दिखा है कि नेता पुत्र चाहे कितना ही ‘पप्पू’ हो, सांसदी या विधायकी उसका जन्मसिद्ध अधिकार ही होता है. पर विधायक पुत्र चपरासी.. सुनने में कुछ असामान्य सा लगता है.
विधायक का बेटा चपरासी क्यों बना?
विधायक जगदीश मीना का कहना है कि उनका बेटा पढ़ाई में कमजोर था. इसलिए ज्यादा पढ़ नहीं पाया और राजनीतिक समझ के अभाव में उसके लिए नौकरी करना ही ठीक रहता. इसीलिए उसने चपरासी पद पर आवेदन किया और अपनी योग्यता से नौकरी हासिल कर ली.
विधायक जी की राय में इसे राजनीतिक शुचिता की मिसाल मानकर उनकी वाहवाही की जानी चाहिए. आखिर सत्ताधारी दल का विधायक होने के बावजूद उन्होने बेटे की राजनीति में बैकडोर एंट्री नहीं कराई. लेकिन विरोधी हैं कि हंगामे से बाज़ नहीं आ रहे. कांग्रेस तो कांग्रेस, कई ‘अपने’ भी टांग खिंचाई में पीछे नहीं हैं.
विरोधियों का आरोप है कि विधायक जी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर बेटे को सरकारी नौकरी दिला दी. सरकारी नौकरी भी किसी ऐसे वैसे दफ्तर में नहीं बल्कि देश के सबसे बड़े राज्य की विधानसभा में. ये तो ‘शाही’ नौकरी है. आखिर विधानसभा में दूसरे दफ्तरों की तुलना में काम कम ही रहता है. और जब चपरासी नेतापुत्र हो तो उससे काम कराने की हिम्मत भी कौन करेगा.
विधायक जगदीश मीना आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं कि जिसमें जितनी योग्यता होगी, उसको उतना ही मिलेगा. मीना सवाल करते हैं कि वे खुद भी बनना तो मंत्री चाहते हैं लेकिन बन पाए क्या? यानी उनके पुत्र में चपरासी बनने की योग्यता थी और अपनी मेहनत से उसने इसे हासिल किया है.
फिर विपक्ष के आरोपों का क्या? तो विधायकजी का कहना है कि कांग्रेस को इसलिए परेशानी है क्योंकि बीजेपी उनकी तरह भाई-भतीजावाद की ओछी राजनीति नहीं करती. हालांकि भाई-भतीजावाद के आरोपों को हवा चपरासी नियुक्त हुए उनके बेटे के बयान से ही मिल रही है. रामकृष्ण मीना ने मीडिया को बताया कि वे तो खेतीबाड़ी करते थे. पिछले साल ही उन्होने 10वीं पास की है. अब पिता ने कहा कि सरकारी नौकरी ज्यादा मुफीद है तो मैंने कर ली.
बहुत से सवालों के जवाब ‘लापता’
विधायक जगदीश मीना बेटे की ‘योग्यता’ सिद्ध करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे. लेकिन यही पर कई सवाल ऐसे उभरते हैं जो गंभीरता के साथ उत्तर मांगते हैं मसलन-
- बताया जा रहा है कि चपरासी के 18 पदों के लिए 18,000 से ज्यादा आवेदन आए थे. इनमें कई आवेदक तो पीएचडी और एमबीए डिग्री धारी भी थे. फिर वो कौनसा पैमाना था, जिस पर 10वीं पास विधायक पुत्र को तरजीह मिली?
- 15 दिसंबर को चपरासी नियुक्ति का नतीजा आया लेकिन इसे तुरंत सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? मीडिया से ही नहीं, बल्कि विधानसभा के स्टाफ से भी इसे क्यों छिपाया गया?
- सफल अभ्यर्थियों को फोन से जानकारी दी गई और उन्हे तुरंत ज्वाइन करने को कहा गया. अधिकतर अभ्यर्थियों ने उसी दिन ज्वाइन भी कर लिया. ऐसी जल्दबाज़ी आखिर क्यों की गई?
आरोप सिर्फ रामकृष्ण मीना पर नहीं है. लोगों का कहना है कि जिन 18 लोगों का चयन हुआ है, वे सब के सब रसूखदारों के रिश्तेदार/नजदीकी हैं. कांग्रेस ने तो इसे सिरे से धांधली बताकर भर्ती को खारिज करने की मांग की है. प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट ने कहा है कि बीजेपी मैनिफेस्टों में 15 लाख नौकरियों का वादा किया गया था. लेकिन रसूखदारों को नौकरी बांटकर बेरोजगारों के गालों पर तमाचा मारा जा रहा है.
वैसे हालिया समय में ये पहला मौका नहीं है जब बीजेपी के किसी विधायक के बेटे ने चपरासी पद के लिए कोशिश की है. निवाई से विधायक हीरा लाल वर्मा के बेटे हंसराज ने भी 2015 में कृषि विभाग में चपरासी पद के लिए आवेदन किया था. ये भी पहला मौका नहीं है जब सरकारी नौकरियों की रेवड़ियां फिर-फिर कर अपनों को ही बांटी गई हो. इसी साल पंचायत सहायकों के पद चहेतों को देने के आरोप लगने के बाद कम से कम 3011 ग्राम पंचायतों में चयन प्रक्रिया को रद्द करना पड़ा था.
अब ये जांच के बाद ही साफ हो सकता है कि विधायक पुत्रों का चपरासी बनना राजनीतिक शुचिता की मिसाल है या फिर अपने राजनीतिक प्रभाव के इस्तेमाल का निकृष्ट तरीका. लेकिन दूसरे राज्यों के उदाहरण देखते हुए जगदीश मीना की इस बात में तो दम लगता है कि अगर उन्हे अपने रसूख का फायदा बेटे को दिलाना ही होता तो मंजिलें और भी थीं