व्यक्ति अपने अवगुण और दूसरे के गुणों को देखे : साध्वी विभाश्रीजी 


शिवपुरी। अधर्म के रास्ते पर चलना आसान और सहज है। अधर्म किया नहीं जाता बल्कि हो जाता है, परंतु धर्म को करने के लिए पुरूषार्थ की आवश्यकता है, लेकिन धर्म के पथ पर अग्रसर होकर ही इंसान भगवान बन सकता है। उक्त उदगार पोषद भवन में प्रसिद्ध जैन संत सुमतिप्रकाश जी महाराज की सुशिष्या साध्वी आभाश्रीजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। धर्मसभा में साध्वी विभाश्रीजी ने बताया कि व्यक्ति को अपने अवगुण और दूसरे के गुणों को देखना  चाहिए और  यदि कोई उसकी प्रशंसा कर रहा है तो उसे यह देखना चाहिए कि क्या वह इस प्रशंसा के लायक है अथवा नहीं और  यदि जवाब नकारात्मक आता है तो उस प्रशंसा के अनुरूप बनने का उसे प्रयास करना चाहिए। 

धर्मसभा में साध्वी विभाश्रीजी ने कहा कि भगवान महावीर  स्वामी ने जीवन पूर्ण करने के समय जो उपदेश दिया वह उत्तराध्यान सूत्र में समाहित है। यह भगवान महावीर  स्वामी के जीवन का  सार है। भगवान ने बताया था कि संसार में चार चीजों का होना दुर्लभ है एक तो इंसान के रूप में जन्म लेना और इंसानियत का होना। दूसरा जिनवाणी को श्रवण करने की कला और तीसरा भगवान के प्रति श्रद्धा भक्ति और चौथा भगवान के गुणों को आचरण के रूप में जीवन में उतारना, लेकिन  इस दुर्लभता को जो प्राप्त कर लेता है उसे ईश्वरत्व प्राप्त करने में देर नहीं लगती है। साध्वी आभाश्रीजी ने बताया कि 84 लाख जीव योनियों में सिर्फइंसान में ही वह क्षमता है कि वह चाहे तो अपने जीवन को ऊध्र्वगामी और  चाहे तो अधोगामी बना  सकता है। अर्थात वह अपने कर्मों से भगवान भी बन सकता है और जीवन में विनाश  को आंमत्रित कर दानव भी बन सकता है। सिर्फ  इंसान के जीवन की भूमि ही उर्वरा होती है। जिस पर वह जैसी चाहे वैसी फसल उगा सकता है। लेकिन जीवन के  चरमोत्कर्ष लक्ष्य ईश्वरत्व को प्राप्त करने के लिए साधना की आवश्यकता होती है। अपने आपको परिमार्जित करने की आवश्यकता होती है। जीवन में सम्यकत्व का आना आवश्यक है और यह सम्यकत्व तथा समभाव जिसने प्राप्त  कर लिया उसने ईश्वरत्व की ओर अपने कदम बढ़ा लिए। 

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सिर्फ धर्म की पूंजी ही साथ जाती है

साध्वी आभाश्रीजी ने अपने प्रवचन में कहा कि इंसान सांसरिक भागदौड़ में इतना उलझा रहता है और धन कमाने में इतना मस्त रहता है कि उसके लिए धर्म बुढ़ापे में करने वाली चीज होती है। जबकि सब जानते हैं कि जीवन का भरौसा नहीं है फिर बुढ़ापे के लिए धर्म को क्यों छोड़ा जा रहा है। उन्होंने कहा कि संसार में धन अर्जित कर जो पूंजी आप एकत्रित करते हैं वह साथ नहीं जाती, लेकिन धर्म की पूंजी मृत्यु के बाद भी साथ जाती है, लेकिन इस स्थायी पूंजी की ओर हमारा कोई ध्यान नहीं है।