प्रकृति प्रदत्त, जीवन मूल्य बाध्यता है, खुशहाल जीवन की
समाचार सेवा।
हम न लिखित है, न ही संगठित और न ही हिंसा में हमारी कोई आस्था और न ही कोई विश्वास। जिसके मन, कर्म, वचन, भाषा, वाणी, चरित्र, व्यवहार, आचरण में अगर हिंसा का भाव हो तो वह कदाचित न तो स्वराज में आस्था रखता है न ही उसका स्वराज में कोई विश्वास। स्वराज तो समृद्ध, खुशहाल जीवन की वह स्वप्रेरित क्रिया है। जिसकी प्रकृति और प्राकृतिक सिद्धान्त में गहरी आस्था होती है।
क्योंकि प्रकृति प्रदत्त जीवन मूल्य, बाध्यता है समृद्ध, खुशहाल जीवन की और उत्तरदायित्व के साथ निष्ठा पूर्ण ईमानदारी से कत्र्तव्य निर्वहन मानवता है।
हम उस महान भू-भाग के रहवासी है, इस सत्य को हम बखूबी समझते है, कि समुचे जीव जगत का कल्याण उसकी समृद्धि, खुशहाली कैसे सम्भव है। मगर कहते है कि परिवर्तन ही प्रकृति का नियम है। सो वर्तमान में हम उस महान भू-भाग के रहवासी परिवर्तन के दौर में है ऐसे में हमारे कत्र्तव्य उत्तरदायित्वों के साथ हमारे जीवन मूल्य और सिद्धान्त भी है जो हमारा प्राकृतिक गुण भी है। ऐसे में हमारा यह कत्र्तव्य उत्तरदायित्व भी है, कि हम जीव जगत की रक्षा और उसके खुशहाल जीवन के लिये पूरी निष्ठा ईमानदारी के साथ कर्म करे।
अगर हम हजारों वर्ष पूर्व सफल सक्षम थे तो आज हम असफल कैसे हो सकते है। जरुरत है आज निष्ठा पूर्ण प्रयासों की जो सम्भव भी है और हमारी विरासत ही नहीं, संस्कृति भी है जिसके संरक्षण और अपने पुरुषार्थ के बल हम अपना खोया कीर्तिमान पुन: स्थापित करेगें, बशर्ते हम न्याय के सिद्धान्त का पालन पूरी निष्ठा ईमानदारी सेे कर पाये और अहिंसात्मक रुप से मानवता का परिचय देते हुये उन सभी जीवों को संरक्षण दे पाये जिसके लिये हमें जाना जाता है और जो हमारी बहुमूल्य पंूजी ही नहीं विरासत है।
जय स्वराज

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