भृगु भवन में मनाया जाएगा भगवान परशुराम जी का जन्मोत्सव  

  शिवपुरी ब्यूरो। प्रतिवर्ष की भांति इस वर्ष भी भगवान श्री परशुराम जी का जन्मोत्सव बड़ी भव्यता के साथ सर्व ब्राह्मण समाज द्वारा भृगु भवन फिजीकल रोड़ पर पूजा अर्चना कर मनाया जाएगा। तत्पश्चात सभी विप्र बन्धुओं द्वारा भगवान परशुराम जी के चालीसा का पाठ भी किया जाएगा इसके बाद भगवान परशुराम जी की महाआरती की जाएगी। तदुपरांत प्रसाद का वितरण किया जाएगा। उक्त बात की जानकारी सर्व ब्राह्मण समाज के प्रदेश संयोजक पं. रामजी व्यास एवं अरूण भार्गव ने दी। 18 अप्रैल बुधवार को सुबह साढ़े 8 बजे दीप प्रज्ज्वलन, ध्वजारोहण और मंगलाचरण से होगी। भगवान परशुराम के जीवन पर विचार और प्रकाश डाला जाएगा आयोजन सुबह 9 बजे महा आरती के साथ प्रारंभ किया जाएगा। महाआरती और आतिशबाजी के बाद अंत में प्रसादी का आयोजन किया जाएगा। इसमें बड़ी संख्या में समाज बन्धु भाग लेने के अनुरोध करने वालों में पं. महेश शर्मा स्वामी जी, अरूण भार्गव, राजेन्द्र पिपलौदा, प्रमोद भार्गव, डॉ. अर्जुन लाल शर्मा, डॉ. ओपी भार्गव, कैलाश भार्गव, राकेश भार्गव, मनोज भार्गव, गिरजेश भार्गव, पं. भगवत शर्मा, संजय बेचैना, उमेश भारद्वाज, विपिन शुक्ला, हरिशंकर बजरिया, पंद्याश शर्मा, श्रीकृष्ण दुबे, राजकुमार शर्मा पत्रकार, लालू शर्मा पत्रकार, राजेन्द्र शर्मा, संदीप शर्मा नीटू, पंकज भार्गव, पं. रामकुमार भार्गव, राकेश शमा, कपिल भार्गव, अभिषेक भार्गव बेटू, डॉ.अुतल भार्गव, अरविन्द्र भार्गव, हरगोविन्द शर्मा, अजय भार्गव, पंकज शर्मा , अरूण पंडित, अभिषेक शर्मा वट्टे, गौरव चौबे, पंकज महाराज, राजकुमार सड़ैया, विजय शर्मा, अरविन्द सड़ैया, महावीर मुदगल, दिलीप मुदगल, घनश्याम गौड़, संजीव शर्मा, संजू, होटल वरूणइन, गजानदंन शर्मा भूरा आदि लोगों ने कार्यक्रम उपस्थित होने की समाज बन्धुओं से अपील की है। 



संक्षिप्त में भगवान परशुम जी जन्म की कथा


अक्षय तृतीया पर भगवान परशुराम की जयंती धूमधाम से मनाई जाती है। भगवान राम ही नहीं, भगवान विष्णु के वामन अवतार में भी पहले यानी त्रेता युग से भी युगों पहले आज के ही दिन भगवान परशुराम महर्षिर् जमदग्नि और माँ रेणुका के घर में पुत्र के रूप में आए थे। भगवान परशुराम को लेकर लोगों भ्रांति भी है कि वे परम क्रोधी थे, लेकिन उनकी दयालुता और दानवीरता बताने के लिए यह एक ही उदाहरण काफी है कि अकेले ही 21 बार धरती को जीतने के बाद उसे ब्राह्मणों को दान भी कर दिया बाद में ब्राह्मणों ने इसका अधिकार क्षत्रियों को देकर ब्राम्हणत्व को सही रूप में परिभाषित किया। यही प्रसंग लोगों को झकझोर कर देखता हैं।