आदर्श राज्य की स्थापना राजा का राजधर्म धर्म अब, वह सत्तायें हो या परिषद


व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
हमारे महान ग्रन्थ भी हमें समय-समय पर आगाह करते रहे है और हमारे महान चरित्रों ने भी मानव धर्म और मर्यादाओं का पालन कर समन्वय सामजस्य सन्तुलन, समरसता का मार्ग हमें दिखाया है। मगर दुर्भाग्य कि त्याग, तपस्यिों की इस पवित्र भूमि पर वह आदर्श स्थितियां हमारी सत्तायें परिषदें कायम नहीं कर पायी। जिसकी आम जनमानस, जीव, जगत, प्रकृति को आशा-आकांक्षायें थी।
जो संदेश हमें वेदो से मिले कि हमारा कर्म ही नहीं, यह धर्म भी होना चाहिए कि हमारे किसी आचरण, व्यवहार या अज्ञानता के चलते हमारे ही बीच के चोर, स्वार्थी, पापी हमारी मानवता का लाभ उठा, कहीं हमारे स्वामी न बन जाये, हम ऐसे लोगों को सत्ता, परिषदों में जाने से या उन्हें स्वामी बनने से ही रोक पाये, न ही उस प्रकृति को संरक्षण दें संरक्षित कर पाये जो हमारे बीच जन-जीव कल्याण के लिये आज भी मौजूद है।
        हम हमारी सत्तायें, परिषदें उस आदर्श राज्य की स्थापना करने में भी अक्षम, असफल साबित हुये जिसे हम राम राज्य के नाम से पुकारते है। जिसमें समय पर बारिश, ठंड, गर्मी, उजाला, अंधेरा और दिनचर्या होती थी। तब न तो लोगों में अकाल मृत्यु का भय था, न ही कोई रोग सताता था और न ही किसी अनर्थ की आशंका राज्यों ही नहीं, गांव, गली, नगर में रहती थी। और हमारे गांव, गली, नगर, जंगल, पहाड़, हस्तपुष्ठ, स्वस्थ मानव ही नहीं जीव जगत और वृक्षों से भरे रहते थे और प्रकृति में सभी जीव स्वच्छंद भाव से विचरण करते थे।
         हमारा महान भू-भाग जिसे हम मां भारती के नाम पुकारते, ऊर्जा, रस, आनन्द और अन्न, जल से भरा रहता था उसके गर्व में मौजूद अकूत सम्पदा के भण्डार भरे रहते थे जो हमारी समृद्धि खुशहाली का प्रमाण था।
अब विचार हमें और हमारे युवाओं, बुजुर्ग, विद्या, विद्यवान, सत्ता, संगठन, संस्थानों को यह करना है कि हम क्या थे और धीरे-धीरे कहां पहुंच गये। आज न तो हमारे पास प्राकृतिक सम्पदा के भण्डार वह जंगल, नीर, नदियां, झरने बचे, न ही जल भू सम्पदा के वह भण्डार और उस भू-भाग पर हमारी वह हस्टपुष्ट, गांव, गली, नगर, शहर जिनके चेहरो पर वह समृद्धि खुशहाली का भाव हो, आज हम अकाल मृत्यु और अस्वस्थ जीवन के मकडज़ाल में उलझ, अब तो इस विचार में भी अक्षम असफल साबित हो रहे है। कि हमारे सही मार्ग क्या है सतत सत्ताओं में बने रह सत्ता सुख और स्वार्थो की पूर्ति है या उस आदर्श राज्य की स्थापना जिसके नाम पर सत्तायें बनती या बिगड़ती रही है।
    मगर इस महान भू-भाग पर यह तभी संभव है जब हम समन्वय, सन्तुलन, समरसता के भाव के साथ सामाजस्य स्थापित कर अपने विद्या, विद्यवान, मेहनतकश, त्याग पुरुषों का सम्मान लौटा उन्हें सम्मान जनक स्थापित कर उनके कौशल का लाभ उठा अपनी विरासत को पोषित और संरक्षित कर पाये।
बरना समय का क्या वह तो चलाये मान है सत्तायें आयेगी जायेगी उनका अपना नाम और काम होगा। मगर तब हमारे लिये न तो वह आदर्श राज्य होगा, न ही राजधर्म का पालन करने वाले लोग। कहते है जिस भू-भाग पर राज व्यवस्था आदर्श न हो जंगल, पहाड़, नदियां, तालाब, झरने दम तोडऩे पर मजबूर हो ऐसी स्थिति पतन के स्पष्ट संकेत है। जो प्रकृति ही नहीं जीव जगत को कभी समृद्ध, खुशहाल नहीं बना सकती और न ही अपनी विरासत। अगर हम जीवन में समृद्धि, खुशहाली चाहते है तो हमें अपने पूर्वजो के आर्शीवाद और बुुजुर्गो के पुण्य प्रताप से बड़ो के संरक्षण में अपने कत्र्तव्य उत्तरदायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा ईमानदारी से करना होगा
जय स्वराज