नैतिक दरिद्रता चरित्र निर्माण में बाधा राष्ट्रीय चरित्र अहम-व्ही.एस.भुल्ले मुख्य संयोजक

स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जब तक हम नैतिक दरिद्रता से दूर राष्ट्रीय चरित्र निर्माण में सफल, सक्षम नहीं होंगे तब तक, समृद्ध, खुशहाल राष्ट्र का हमारा सपना अधूरा ही बना रहेगा। क्योंकि राष्ट्रीय चरित्र निर्माण में नैतिक दरिद्रता बड़ी बाधा होती है।
         तकनीक के सहारे बौद्धिक, विद्या चोरी का विकृत स्वरूप और छदम संस्कृति सहित प्रतिभाओं का प्रतिकार किसी भी समाज, राष्ट्र के लिये उस धुन के समान है जो बड़े से बड़े समाज राष्ट्र को अन्दर ही अन्दर पूर्णता: खोखला कर उसकी गुणवत्ता समाप्त कर उसे निस्प्राण बना देती है। निश्चित ही अपनो के मुंह से प्रसंशा और पुरुस्कार प्राप्त करने में हमें कभी-कभी गौरव और सुख का अनुभव होता है और अनुभूति भी। मगर यह भी सच है, और हमारा अनुभव भी रहा है कि लाख कोशिसों के बावजूद भी आज हम अपनों के बीच राष्ट्रीय चरित्र निर्माण के आभाव में राष्ट्रीयता का बोध नहीं करा पायें और आज हम अपनो के ही बीच खण्ड-खण्ड नजर आते है।
     क्योंकि हमारी सत्तायें, संगठन और हम वह राष्ट्रीयता व सामर्थ अपनो के बीच जाग्रत नहीं कर सके और सफल होने से पूर्व हम असफल हो गये। आज हम ही नहीं, हमारी सत्तायें, संगठन, संस्थाओं का कत्र्तव्य ही नहीं, उत्तरदायित्व है कि राष्ट्र में विभिन्न वन्दनाओं के साथ राष्ट्र बन्दना के स्वर भी गूंजना चाहिए अन्यथा की स्थिति में हमारी महत्वकांक्षा उपासना, आस्था, समता के मार्ग भी संघर्ष मुक्त नहीं रह पायेंगे।
      इसीलिये आज हमें व्यक्ति से व्यक्ति, समाज से समाज का एकीकरण राष्ट्रीयता के सूत्र से करना होगा। जिसकी शुरुआत हमें समृद्ध, खुशहाल राष्ट्र के लियेे अविलम्ब करनी होगी। नैतिक दरिद्रता आज हमारे सामने बड़ी चुनौती है। जिसे हमें स्वीकार कर राष्ट्र निर्माण से पूर्व चरित्र निर्माण की शीघ्र शुरूआत करना चाहिए। हमें यह कदाचित नहीं भूलना चाहिए कि व्यक्ति, संस्था, संगठनों, सत्ताओं से महत्वपूर्ण  राष्ट्र होता है।
       इतिहास गवाह है कि स्वार्थवत राजनीति, सत्ता, संगठनों की नीतियों ने समय-समय पर हमारे सामर्थ, पुरुषार्थ और आदर्श, जीवन मूल्य, सिद्धान्तों का बड़ा अहित किया है। जिसे दुर्भाग्य पूर्ण ही कहा जायेगा। सवाल आज यह नहीं कि सत्ता में कौन रहेगा, बल्कि यक्ष सवाल यह होना चाहिए कि राष्ट्र के जीवन मूल्य, परम्परा, संस्कृति, सिद्धान्तों की रक्षा कौन करेगा। अब विचार हमें और हमारी सत्ता, संगठन, संस्था, युवा, बुजुर्गो को करना है।
जय स्वराज