मंथन न्यूज़ भोपाल -पदोन्नति में आरक्षण कानून रद्द होने के बाद से अटकी पदोन्नतियों का रास्ता निकालने के लिए बनाए जा रहे नए नियम ठंडे बस्ते में चल गए हैं। इसके लिए मंत्रिमंडलीय उपसचिव के पास मसौदा भी भेजा गया पर कोई अंतिम राय अब तक नहीं बन सकी है।
जबकि यह मसौदा सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील की देखरेख में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों से रायशुमारी कर तैयार किया गया था। उधर, पदोन्नति में आरक्षण का मुद्दा नहीं सुलझने से कर्मचारियों की नाराजगी जस की तस है। हालांकि सेवानिवृत्ति की आयु 60 से बढ़ाकर 62 करने के बाद यह माना जा रहा था कि आरक्षण का मुद्दा ठंडा पड़ जाएगा।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने साल की शुरुआत में पहली संयुक्त बैठक में पदोन्नति बिना सेवानिवृत्ति को अन्याय करार देते हुए पदोन्नति का रास्ता निकालने नियम बनाकर एक माह में प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। इससे अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी-कर्मचारी संघ (अजाक्स) और सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी-कर्मचारी संगठन (सपाक्स) को उम्मीद जागी थी कि सरकार कोई रास्ता निकाल लेगी।
सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री सचिवालय और सामान्य प्रशासन विभाग के अधिकारियों ने मुख्यमंत्री के निर्देश के मद्देनजर तेजी के साथ कवायद की। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने नए नियम के मसौदे पर सहमति बनाने के लिए चर्चाओं का दौर शुरू किया। वनमंत्री डॉ. गौरीशंकर शेजवार की अध्यक्षता में बनी समिति के पास मसौदा भी भेजा पर कोई अंतिम राय नहीं बन पाई।
इसी बीच अजाक्स और सपाक्स के मैदानी कार्यक्रम चलते रहे। इसी दौरान सरकार ने अधिकारियों-कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की आयु 60 से 62 करने की घोषणा कर दी। एक दिन में आदेश भी निकल गए और मार्च में सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति रुक गई। यह माना गया कि इस कदम से कर्मचारी वर्ग में जो असंतोष पनप रहा था वो काबू हो जाएगा पर कर्मचारी संगठन संतुष्ट नहीं हैं।
मप्र तक सीमित नहीं मामला, सोच-समझकर उठाना होगा कदम
उधर, सरकार के जिम्मेदार अधिकारियों का कहना है कि पदोन्नति में आरक्षण का मुद्दा सिर्फ मप्र तक सीमित नहीं रहा है। कई और राज्यों की याचिकाएं लंबित हैं। ऐसे में कोई नियम बनाना मुश्किल खड़ी कर सकता है, इसलिए कोई भी कदम कानून के दायरे में रहते हुए ही उठाना होगा।
हम तो सोच रहे थे बजट सत्र में नियम आएगा
अजाक्स के प्रवक्ता विजय श्रवण का कहना है कि मुख्यमंत्री की घोषणा के बाद हम भरोसे में थे कि नए नियम बनेंगे। सुप्रीम कोर्ट के वकील की देखरेख में नियम का मसौदा बना था। हम मानकर चल रहे थे कि विधानसभा के बजट सत्र में सरकार नए नियम लाएगी पर मसौदे को ही ठंडे बस्ते में डाल दिया। सेवानिवृत्ति की आयु 60 से बढ़ाकर 62 जरूर कर दी पर इससे पदोन्नति का समाधान कहां हुआ। जो समिति बनी थी, उसकी रिपोर्ट कहां है। वो अभी तक क्यों सामने नहीं आई।
असमानता का अंत नहीं हुआ
सपाक्स के संस्थापकों में शामिल डॉ. केएस तोमर का कहना है कि सरकार मामले को टालना चाहती है। सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाकर यह मान लेना कि जो लोग सपाक्स के साथ जा रहे थे, वे नहीं जाएंगे, गलत साबित होगा। हमें भी मालूम है कि यह लड़ाई लंबी चलेगी पर हम पीछे हटने वाले नहीं हैं। सेवानिवृत्ति की आयु सीमा बढ़ाने से पदोन्नति का हक नहीं मिला। असमानता का अंत भी नहीं हुआ। जूनियर साहब बनकर बैठे हैं।


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