सिंधी साहित्य और रंगमंच की विशिष्ट विभूति थे "फ़ानी"  

 भोपाल के साहित्य जगत में सिंधी के लोकप्रिय कवि श्री के.व्ही. बेगवानी "फ़ानी" का विशेष स्थान था। इन्होंने मध्यप्रदेश सिंधी साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष का पद भी संभाला। सिंध के मशहूर कवि शेख अयाज़ "फ़ानी" साहब के शिष्य थे। इसके अलावा सिंधी की प्रख्यात गायिका भगवंती नावानी ने भी फ़ानी साहब के लिखे गीत को स्वर देकर उनकी लेखन श्रेष्ठता को प्रमाणित किया था। अनेक साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित श्री बेगवानी जीवन के अंत तक सृजनशील रहे। वे एक अच्छे मनुष्य थे और नई पीढ़ी को साहित्य, संगीत और रंगमंच से जोड़ने के लिए प्रयास करते रहते थे। सिंध के "मियां जो गोठ" में 4 अप्रैल 1914 को एक मध्यम वर्गीय परिवार में उनका जन्म हुआ। देश विभाजन के बाद के वे परिजन के साथ भोपाल आकर बसे। पेशे से शिक्षक थे। उन्हें अध्ययन और लेखन का शौक था। भोपाल में उन्हें अपनी रूचि के काफी अनुकूल वातावरण मिला। वे हिंदी, ऊर्दू, अंग्रेजी और अन्य भाषाओं के साहित्यकारों के सम्पर्क में रहते थे। पूरे देश में उनका अच्छा परिचय भी था।

      "फ़ानी" साहब को उनकी पुस्तक "सिक सोज ऐं साज" से काफी ख्याति मिली। एक उत्कृष्ट कवि के रूप में उन्होंने खास पहचान बनाई। वर्ष 1985 में पचमढ़ी में संस्कृति विभाग की ओर से आयोजित एक लेखन कार्यशाला की बदौलत मैं उनके सम्पर्क में आया था। बाद में 1989 में भोपाल में जनसम्पर्क विभाग में पदस्थ होने के बाद भोपाल की सिंधी कालोनी में उनके निवास जाकर भी भेंट की। उस दौर में सिंधी कालोनी की नारी शाला जो एक सिलाई प्रशिक्षण केन्द्र था, शाम के समय नाटक रिहर्सल का स्थान बन जाता था। इसी जगह मेरी मुलाकात उस वक्त की जानी-मानी शिक्षिका और कॉरियोग्राफर दादी गोपी से भी हुई। अशोक बुलानी के निर्देशन में भारतीय स्टेट बैंक के साथी कलाकारों के साथ मुझे भी नाटकों में छोटी भूमिकाएं निभाने का अवसर मिला। के.व्ही.बेगवानी "फ़ानी" जैसी शख्सियत से मिलने के बाद हर व्यक्ति प्रभावित हो जाता था। सामाजिक विषयों पर नाटकों के लेखन के लिए "फ़ानी" साहब की विशेषज्ञता के सभी कलाकार कायल थे। वे अंग्रेजी में भी अच्छा दखल रखते थे। स्वभाव से सहज, सरल और आत्मीय होने के कारण उन्होंने अपना एक सर्किल बना लिया था।

      भोपाल में सिंधी रंगमंच के बीच उन्होंने 60 के दशक में बोए थे। आज लगभग 200 कलाकार भाषाई नाटकों को खेलते हुए अपना स्थान बना चुके हैं। "फ़ानी" साहब का अवसान 9 अप्रैल 1995 को भोपाल में हुआ था। "फ़ानी" साहब के बेटे राजकुमार बेगवानी ने पिता की साहित्यिक धरोहर को संभाल कर रखा है। राजकुमार स्वयं एक अच्छे पाठक भी हैं। एक महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने और उनकी पत्नी ने स्व. फ़ानी के मित्रों और शिष्‍यों से सम्पर्क भी बनाए रखा है। स्व. के.व्ही. बेगवानी "फ़ानी" की जयंती पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करते हुए आदरांजलि पेश करता हूं।

 

·      अशोक मनवानी