OBC आरक्षण में कोटा को लेकर क्यों मची है मोदी और योगी सरकार के बीच होड़!



पिछड़ा आरक्षण कोटे के वर्गीकरण को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार के बीच होड़ देखी जा रही है. देखना है कि इस मामले में ठोस कदम पहले कौन सरकार उठा पाती है. राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार अगले लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए एनडीए के लिए इसे जरूरी कदम माना जा रहा है.


राजनीतिक प्रेक्षकों के अनुसार यह कदम एसपी-बीएसपी की संयुक्त राजनीतिक ताकत से मुकाबले में एनडीए के लिए मददगार साबित हो सकता है. वर्गीकरण का यह काम योगी सरकार को राज्य सरकार की नौकरियों के लिए करना है तो मोदी सरकार को केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए.


उत्तर प्रदेश के पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री ओम प्रकाश राजभर के दबाव के बीच गत 22 मार्च को उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधान सभा में कह दिया ‘यदि जरूरत हुई तो अतिपिछड़ा और अतिदलित के लिए अलग से आरक्षण देने पर विचार करेंगे.’


यानी पिछड़ों के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत आरक्षण कोटा के भीतर कोटा होगा. उन्होंने यह भी कहा कि ‘कमजोर वर्ग का जो हिस्सा विकास में पिछड़ गया है, उन्हें मुख्य धारा में लाने की जरूरत है.’


लोकसभा चुनाव से पहले मास्टर स्ट्रोक लगाने की तैयारी


उधर केंद्र सरकार ने गत 21 मार्च को जस्टिस रोहिणी आयोग के कार्यकाल को 20 जून तक बढ़ा दिया है. 27 प्रतिशत के आरक्षण कोटे के वर्गीकरण के लिए गत 2 अक्तूबर, 2017 को जस्टिस जी. रोहिणी के नेतृत्व में एक आयोग का गठन किया गया था. उसके कार्यकाल का यह दूसरा और अंतिम विस्तार है.


20 जून को रिपोर्ट आ जाने के बाद केंद्र सरकार उस पर कोई निर्णय करेगी. यानी अब उस आयोग को और विस्तार देने के मूड में सरकार नहीं है. यानी जल्द निर्णय करना है. लोकसभा चुनाव अब बहुत दूर नहीं है.

याद रहे कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग ने सन्  2011 में ही मनमोहन सरकार से यह सिफारिश की थी कि मंडल आरक्षण के 27 प्रतिशत के कोटे को तीन भागों में बांट दिया जाना चाहिए.

मनमोहन सरकार को राजनीतिक दृष्टि से वह सिफारिश अनुकूल नहीं लगी. इसलिए उसने इस सिफारिश को ठंडे बस्ते में डाल दिया था. पर नरेंद्र मोदी सरकार ने उस पर काम शुरू किया.

दरअसल कोटे के वर्गीकरण का राजनीतिक नुकसान आरजेडी और एसपी जैसी पार्टियों को हो सकता है. यदि अनुसूचित जातियों के आरक्षण कोटे का भी वर्गीकरण हो जाए तो बीएसपी को उसका राजनीतिक नुकसान हो सकता है. 2005 में बिहार में सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार ने अति पिछड़ों के लिए आरक्षण सहित कई अन्य कदम उठाए.

उससे लालू प्रसाद के दल को नुकसान उठाना पड़ा और जेडीयू को लाभ मिला. देश के कई अन्य कई राज्यों में भी अति पिछड़ी जातियों के लिए अलग से आरक्षण कोटे का प्रावधान किया गया है.

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यहां तक कि सन् 1978 में जब बिहार में कर्परी ठाकुर सरकार ने राज्य सरकार की नौकरियों में पिछड़ों के लिए आरक्षण लागू किया तो उसमें अति पिछड़ों के लिए अलग कोटा निर्धारित किया गया था.


सन् 2000 में बिहार का बंटवारा हुआ. झारखंड के गठन के बाद आदिवासियों की आबादी शेष बिहार में बहुत कम रह गई. बिहार सरकार ने आरक्षण का नए सिरे से बंटवारा किया. मौजूदा प्रावधान के अनुसार बिहार में पिछड़ों के लिए 12 प्रतिशत और अति पिछड़ों के लिए 18 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है. तीन प्रतिशत आरक्षण पिछड़े वर्ग की महिलाओं के लिए है. एक प्रतिशत आरक्षण आदिवासियों के लिए है.

उधर केंद्र सरकार की नौकरियों में जो 27 प्रतिशत OBC आरक्षण का प्रावधान है,उसमें कोई वर्गीकरण नहीं है जबकि इसकी मांग होती रही है.

अति पिछड़ों की शिकायत रही है कि OBC आरक्षण का अधिक लाभ मजबूत पिछड़ी जातियों के उम्मीदवार ही उठा लेते हैं जबकि अति पिछड़ों की आबादी अपेक्षाकृत अधिक है. रोहिणी आयोग इस मामले में तथ्य जुटा रहा है. आयोग ने उच्चस्तरीय शैक्षणिक संस्थानों से कुछ आंकड़े मांगे हैं. वे आंकड़े पिछड़ों के नामांकन केे बारे में हैं.

UP Minister Om Prakash Rajbhar

आयोग को देखना है कि नामांकन में पिछड़ी जातियों के किस हिस्से को उचित भागीदारी नहीं मिल रही है. साथ ही,आयोग सरकारी और अर्ध सरकारी निकायों में पिछड़ी जातियों के कर्मचारियों व अफसरों के आंकड़े भी मांगे हैं. कुछ अन्य तथ्य भी जुटाए जा रहे हैं. इन तथ्यों के विश्लेषण के बाद रोहिणी आयोग 20 जून तक अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप देगा. अब उस पर अंतिम निर्णय करना केंद्र सरकार के हाथों में है.

ताजा जानकारी के अनुसार केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण कोटे में से अभी औसतन सिर्फ 11 प्रतिशत पद ही भर पा रहे हैं. वर्गीकरण कर देने के बाद यह प्रतिशत बढ़ जाने की उम्मीद जाहिर की जा रही है.

पर वर्गीकरण का यदि सचमुच कोई निर्णय हुआ तो उसका राजनीतिक नुकसान सबसे अधिक एसपी और आरजेडी को हो सकता है. उन दलों पर आरोप है कि ये खुद को पूरे पिछड़े वर्ग का नेता बनने का दावा तो करते हैं, पर अधिक लाभ सिर्फ मजबूत पिछड़ी जातियों को देते या दिलवाते हैं.