कौन खुशी से मरता है, मर जाना पड़ता है..

मुरादाबाद:

शाम ढले हर पंछी को घर जाना पड़ता है,

कौन ख़ुशी से मरता है मर जाना पड़ता है..

शायर अनवर जलालपुरी का यह शेर हर एक की ज़ुबां पर है। आलमी शोहरत के मालिक शायर और नाजिम (संचालक) जनाब अनवर जलालपुरी का ब्रेन हैमरेज की वजह से इंतकाल होने से साहित्य जगत गमगीन हो गया है। विदेश के साथ भारत और मुरादाबाद में आयोजित हुए कई मुशायरों में शिरकत करने वाले अनवर जलालपुरी के अंदाज़ और लफ्जों को पिरोने के साथ बेहतरीन अदा में शेर को मंच पर कहने की बातें याद आ रही हैं। उर्दू अदब को उनके इंतकाल से नुकसान पहुंचा है। उनकी कमी शायद ही पूरी हो पाए। गंगा-जमुनी तहजीब के प्रतीक अनवर जलालपुरी के इंतकाल से साहित्य प्रेमियों में शोक की लहर दौड़ गई। वह ऐसे शायर थे जिन्होंने भगवत गीता का उर्दू में अनुवाद किया था।

......................

अपने अभी तक के जीवन मैं उनके साथ कई बार मंच साझा कर चुका हूं। वह गंगा-जमुनी तहजीब के बीच जो लोग दूरियां बनाते थे। उसे दूर करने का काम करते थे। भगवत गीता का उन्होंने उर्दू में अनुवाद करके सूबे के साथ ही देश को बहुत बड़ा संदेश देने का काम किया था। प्रदेश सरकार ने उन्हें यश भारती पुरस्कार से सम्मानित भी किया था। उनका इंतकाल होने से मुझे व्यक्तिगत क्षति हुई है। साहित्य जगत ने एक बहुत बड़ा हीरा खो दिया है। तीन साल पहले आखिरी बार मैं उनसे जयपुर में आयोजित हुए मुशायरे में मिला था। आज भी उनके मंच संचालन की अदा मेरे जेहन में ताजा हो जाती है।

-डॉ.माहेश्वर तिवारी,नवगीतकार।

--------------------

अनवर जलालपुरी का जाना मेरे लिए मेरा जाती नुकसान है। हिंदुस्तानी तहजीब के अलंबरदार थे जिसका परचम लेकर मैं चल रहा हूं। मेरा एक साथी कम हो गया। हम लोग सफर में बहुत साथ रहते थे और आपस में अदब की बातें मुशायरों की बातें एक दूसरे से शेयर करते थे। गंगा जमुनी तहजीब को आगे बढ़ाने में उनका बहुत बड़ा योगदान है।

-प्रोफेसर वसीम बरेलवी

....................

अनवर जलालपुरी साहब न सिर्फ मुशायरों के नाजिम थे बल्कि बहुत अच्छे शायर और बहुत अच्छे इंसान भी थे। उनके जाने से जो खला पैदा हो गया है उसे कभी पूरा नहीं किया जा सकता। वह ¨हदू और मुस्लिम एकता के सबसे बड़े प्रतीक थे।

डॉ. मुजाहिद फराज, शायर

...------------------

पिछली पाच दहाइयों के मुशायरों को संभालने सजाने संवारने में तीन लोगों ने बहुत अहम किरदार अदा किया है। मलिक ज़ादा मंजूर अहमद साहब, अनवर जलालपुरी साहब और मंसूर उस्मानी साहब। तीनों की अपनी अलग अलग शैली रही है और इसीलिए तीनों ने अपना अलग मुकाम भी बनाया। मलिक ज़ादा साहब कुछ बरस पहले हमें छोड़ कर चले गए, और आज अनवर जलालपुरी साहब ने भी इस दुनिया को अलविदा कह दिया है। अनवर जलालपुरी साहब ने हिंदुस्तान और हिंदुस्तान के बाहर सैकड़ों मुशायरों में अपनी निजामत और ठहर ठहर के बोलने वाली अपनी शैली से सामईन को बाधे रखा। इसके साथ ही उनके कई तखलीकी काम थे जिनमें उनका आखिरी एहम काम भगवत गीता को उर्दू में मंज़ूम तर्जुमा था। जो काफी सराहा गया। मुशायरों के एक अहम नाजि़म के तौर पर वह हमेशा याद किए जाते रहेंगे।

-जिया जमीर, शायर

.......................

इन्सेट--

वह दुनिया से गए दिलों से नहीं..

-यह 2018 की दूसरी सुबह ऐसी दर्दनाक खबर लेकर आई कि दिन में भी अंधेरे का गुमान होने लगा। कल शाम ही हिंदी के एक बड़े कवि सुरेंद्र दुबे के बिछड़ने की खबर आई थी, तो अगली सुबह जनाब अनवर जलालपुरी के दुनिया से रूठ जाने की खबर लेकर आई। मेरा उनसे 1976 से परिचय था। 1980 से लगातार मुशायरों के मंच की यात्रा में उनका हमसफर रहा। उम्र में वह मुझसे सिर्फ छह या सात साल बड़े थे, मगर उनका कद मुझसे सदियों ज्यादा का था। एक बड़े भाई और एक दोस्त के रूप में मुझे उनसे बहुत प्यार मिला। 40-42 साल की यह दास्ता चंद लफ्जों में समेट पाना बहुत मुश्किल है। वह मुशायरों के नाजिम और शायर की हैसियत से ज्यादा मशहूर थे, लेकिन हकीकत में वह एक बहुत बड़े लेखक, चिंतक और विचारक भी थे। उनका ताजातरीन कारनामा शायराना उर्दू अनुवाद है। वह उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड के चेयरमैन भी रहे। उन्हें सरकार ने यश भारती सम्मान भी दिया, लेकिन इन सम्मानों से ज्यादा बड़ा सम्मान उनका यह है कि वह दुनिया भर के मुशायरा सुनने वालों के दिलों में बसे रहेंगे। आज निजामत के तख्त पर उनकी जगह उनकी यादों ने ले ली है। उनके जाने से जो एक सन्नाटा मुशायरों की दुनिया में आएगा जो एक बे-रौनकी महफिलों में आएगी। उसके बारे में सोच-सोचकर परेशान हूं। मेरा यह दर्द आज दुआ बन गया है, अनवर जलालपुरी अंग्रेजी के अध्यापक थे उर्दू के साहित्यकार थे हिंदी के ज्ञानी थे। ऐसी शख्सियत हमारे दरमियान से उठी है, तो उनका गम भी बहुत देर तक हमें सताएगा। इस मौके पर मुझे अपने वालिद जनाब गौहर उस्मानी का यह शेर बहुत याद आ रहा है

खंडहर दयारे वफा के कुरेद कर देखो

हमारे नाम का पत्थर जरूर निकलेगा,

अल्लाह उनकी मगफिरत करें, तसल्ली की बात बस इतनी है कि वह दुनिया से गए हैं अपने चाहने वालों के दिलों से नहीं।

-मंसूर उस्मानी,मशहूर शायर।

------------------

मुरादाबाद में कई मुशायरों का संचालन किया

मंगलवार को उनके निधन पर शोक व्यक्त करते हुए शायरी जगत के लोगों ने उन्हें खिराज-ए-अकीदत पेश किया। उन्होंने कई किताबें लिखीं जिनमें 'जेहनुमा राहरो के रहनुमा तक' काफी प्रसिद्ध रही। फिल्मों में डॉयलाग लिखे।

बकौल शायर कशिश वारसी, अनवर जलालपुरी ने मुरादाबाद के कई मुशायरों में शिरकत की। 1995-96 में उन्होंने पीतलनगरी महोत्सव में मुशायरे का संचालन किया। महानगर में लगने वाली कृषि प्रदर्शनी में भी उन्होंने कई मुशायरों में शिरकत की। उनके शेरों में इंसान की जिंदगी का दर्द, वतन की मुहब्बत व देशभक्ति छलकती है।

उन्होंने लिखा है-

खास लोगों से भी रस्म राह रखते थे।

पुराने लोग गजब की निगाह रखते थे।