सीन 2: 2019 में इस वक्त देश के सबसे लोकप्रिय नेता नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी के लिए कमर कस रही है. इस वक्त महज 44 सीटों पर सिमटी कांग्रेस गुजरात चुनावो और राजस्थान उपचुनावों के बाद हताशा छोड़कर फिर से उत्साहित दिख रही है. अब यहीं से बड़ा सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस 2004 जैसा करिश्मा 2019 में दोहरा पाएगी? इसके पीछे एक बड़ी बात यह भी है कि अब तक कोई भी गैर-कांग्रेसी सरकार लगातार दो टर्म सत्ता में पूरे नहीं कर पाई है.
कांग्रेस का ट्रैक-रिकॉर्ड
1. 1952-84 तक जब इस पार्टी का दबदबा था, तब इसका वोट प्रतिशत कभी 34 प्रतिशत से नीचे नहीं गिरा. 1984-2009 के दौरान जब यह अपेक्षाकृत कमजोर हुई, तब भी इसका वोट शेयर 25 प्रतिशत से नीचे नहीं गिरा. 2014 में पहली बार कांग्रेस का वोट शेयर राष्ट्रीय स्तर पर 20 प्रतिशत से नीचे गिरा है. अब राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस को सत्ता में लौटने के लिए वोट शेयर को बढ़ाने की सबसे बड़ी चुनौती है.
1. 1952-84 तक जब इस पार्टी का दबदबा था, तब इसका वोट प्रतिशत कभी 34 प्रतिशत से नीचे नहीं गिरा. 1984-2009 के दौरान जब यह अपेक्षाकृत कमजोर हुई, तब भी इसका वोट शेयर 25 प्रतिशत से नीचे नहीं गिरा. 2014 में पहली बार कांग्रेस का वोट शेयर राष्ट्रीय स्तर पर 20 प्रतिशत से नीचे गिरा है. अब राहुल गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस को सत्ता में लौटने के लिए वोट शेयर को बढ़ाने की सबसे बड़ी चुनौती है.
2. पहले के दौर में कांग्रेस की अधिकाधिक राज्यों में सरकारें थीं. अब स्थिति बदल गई है. अब यह रुतबा बीजेपी के पास है. बीजेपी के पास इस वक्त कांग्रेस की तुलना में अधिक राज्यों में सत्ता है. इस वक्त गठबंधन मिलाकर बीजेपी की 21 राज्यों में सत्ता है. ऐसे में बीजेपी के पास अधिक मजबूत बेस है.
3. 1980 के चुनावों को यदि छोड़ दिया जाए तो 1971, 1984 और 2009 में कांग्रेस की क्रमश: 69, 62 और 61 सीटों की बढ़ोतरी हुई. यानी कि कांग्रेस की मोटेतौर पर अभी तक अधिकाधिक 70 सीटें बढ़ी हैं. यदि इस बार कांग्रेस फिर से 70 सीटों तक बढ़ोतरी कर लेती है तो उसका सीधा असर बीजेपी पर पड़ेगा.
लाख टेक का सवाल -क्या कांग्रेस 2019 में मोदी रथ को रोक पाएंगी
4. यदि बीजेपी की 60 सीटें कम हुईं तो वह स्पष्ट बहुमत से दूर हो जाएगी. दूसरी तरफ महज 44 सीटों के बेस पर खड़ी कांग्रेस को अधिकतम 100 सीटों के इजाफे के मकसद से मैदान में उतरना होगा. तभी बीजेपी के मुकाबले मुख्य विपक्षी दल के रूप में खड़ी हो पाएगी.
5. कांग्रेस को इसके साथ-साथ मजबूत गठबंधन करने होंगे. ये गठबंधन कुछ इसी तरह के होने चाहिए जैसे 2015 में बिहार में महागठबंधन के रूप में किया गया था. उस दौरान राजद-जदयू-कांग्रेस गठबंधन ने मिलकर बीजेपी को हरा दिया था. इन गठबंधनों के दम पर यदि कांग्रेस, बीजेपी को 200 के आस-पास रोक सकने में कामयाब होती है तो ही सत्ता की आस वह दोबारा देख सकती है.
गुजरात: पीएम मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के गृह राज्य गुजरात में पिछले साल हुए विधान सभा चुनाव में बमुश्किल भाजपा की बादशाहत बरकरार रही। 2012 के मुकाबले भाजपा को 17 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा और 182 सदस्यों वाली विधानसभा में मात्र 99 सीटें ही जीत पाई। हालांकि, 2014 के लोकसभा चुनाव में गुजरात की सभी 26 संसदीय सीटों पर भाजपा की जीत हुई थी। यानी साफ है कि 2014 की मोदी लहर 2017 तक आते-आते गुजरात में कमजोर पड़ चुकी है। अब मोदी-शाह की जोड़ी उस लहर को कैसे फिर से जगा पाएंगे, कहना मुश्किल लगता है। वैसे बजट 2018 को किसानों, गरीबों और गांवों पर फोकस कर भाजपा ने मतादाताओं के बड़े वर्ग को साधने की कोशिश की है। भाजपा की यह मुहिम रंग लाएगी या नहीं यह तो 2019 में ही पता चल सकेगा।
राजस्थान: में हाल ही में यहां हुए उप चुनाव ने जाहिर कर दिया कि वहां भी भाजपा की स्थिति अच्छी नहीं है। दो संसदीय और एक विधान सभा सीट पर हुए उप चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। हालात ऐसे हैं कि राज्य भाजपा में ही दो फाड़ है और केंद्रीय नेतृत्व से राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की मांग की जा रही है। इस साल के अंत तक यहां विधानसभा चुनाव भी होने हैं। 2014 के लोकसभा में राजस्थान की सभी 25 सीटें भाजपा को मिली थीं लेकिन अब वसुंधरा सरकार के खिलाफ उपजे असंतोष और मोदी सरकार के खिलाफ बनी हवा 2019 में मोदी राज की वापसी में अड़ंगे डाल सकता है। इधर, कांग्रेस पहले से मजबूत स्थिति में आई है।
मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश में भी इस साल के आखिर तक विधान सभा चुनाव होने हैं। वहां भी शिवराज सिंह चौहान सरकार के खिलाफ एंटी इनकमबेंसी फैक्टर हावी है। लिहाजा माना जा रहा है कि वहां भी भाजपा के लिए राह 2014 के मुकाबले आसान नहीं होगी। बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 29 में से 27 सीटें मिली थीं। हालांकि, कांग्रेस नेताओं की तीन खेमे में बंटा होना भाजपा के लिए सुनहरा मौका हो सकता है।
उत्तर प्रदेश: देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में करीब साल भर पहले तक भाजपा की लहर थी। विधानसभा में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला तो राजनीतिक वनवास खत्म करते हुए पार्टी ने योगी को सीएम बनाया। मगर देश में बनते-बिगड़ते सियासी समीकरण और दलित-मुस्लिम विरोधी होने का भाजपा पर लगता ठप्पा भाजपा के लिए साल 2019 की राह में रोड़ा अटका सकता है। 2014 में यहां की 80 लोकसभा सीटों में से 73 भाजपा और सहयोगियों की झोली में गई थी। अगले साल होने वाले संसदीय चुनावों में योगी सरकार का कामकाज, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और गैर भाजपाई-गैर कांग्रेसी राजनीतिक समीकरण अहम भूमिका निभा सकता है। वैसे अगले महीने होने वाले फुलपुर और गोरखपुर संसदीय उप चुनाव में 2019 की झलक दिखाई दे सकती है। इन दोनों सीटों पर भाजपा की जीत हुई थी।
गुजरात: पीएम मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के गृह राज्य गुजरात में पिछले साल हुए विधान सभा चुनाव में बमुश्किल भाजपा की बादशाहत बरकरार रही। 2012 के मुकाबले भाजपा को 17 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा और 182 सदस्यों वाली विधानसभा में मात्र 99 सीटें ही जीत पाई। हालांकि, 2014 के लोकसभा चुनाव में गुजरात की सभी 26 संसदीय सीटों पर भाजपा की जीत हुई थी। यानी साफ है कि 2014 की मोदी लहर 2017 तक आते-आते गुजरात में कमजोर पड़ चुकी है। अब मोदी-शाह की जोड़ी उस लहर को कैसे फिर से जगा पाएंगे, कहना मुश्किल लगता है। वैसे बजट 2018 को किसानों, गरीबों और गांवों पर फोकस कर भाजपा ने मतादाताओं के बड़े वर्ग को साधने की कोशिश की है। भाजपा की यह मुहिम रंग लाएगी या नहीं यह तो 2019 में ही पता चल सकेगा।
राजस्थान: में हाल ही में यहां हुए उप चुनाव ने जाहिर कर दिया कि वहां भी भाजपा की स्थिति अच्छी नहीं है। दो संसदीय और एक विधान सभा सीट पर हुए उप चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। हालात ऐसे हैं कि राज्य भाजपा में ही दो फाड़ है और केंद्रीय नेतृत्व से राज्य में नेतृत्व परिवर्तन की मांग की जा रही है। इस साल के अंत तक यहां विधानसभा चुनाव भी होने हैं। 2014 के लोकसभा में राजस्थान की सभी 25 सीटें भाजपा को मिली थीं लेकिन अब वसुंधरा सरकार के खिलाफ उपजे असंतोष और मोदी सरकार के खिलाफ बनी हवा 2019 में मोदी राज की वापसी में अड़ंगे डाल सकता है। इधर, कांग्रेस पहले से मजबूत स्थिति में आई है।
मध्य प्रदेश: मध्य प्रदेश में भी इस साल के आखिर तक विधान सभा चुनाव होने हैं। वहां भी शिवराज सिंह चौहान सरकार के खिलाफ एंटी इनकमबेंसी फैक्टर हावी है। लिहाजा माना जा रहा है कि वहां भी भाजपा के लिए राह 2014 के मुकाबले आसान नहीं होगी। बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को 29 में से 27 सीटें मिली थीं। हालांकि, कांग्रेस नेताओं की तीन खेमे में बंटा होना भाजपा के लिए सुनहरा मौका हो सकता है।
उत्तर प्रदेश: देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में करीब साल भर पहले तक भाजपा की लहर थी। विधानसभा में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला तो राजनीतिक वनवास खत्म करते हुए पार्टी ने योगी को सीएम बनाया। मगर देश में बनते-बिगड़ते सियासी समीकरण और दलित-मुस्लिम विरोधी होने का भाजपा पर लगता ठप्पा भाजपा के लिए साल 2019 की राह में रोड़ा अटका सकता है। 2014 में यहां की 80 लोकसभा सीटों में से 73 भाजपा और सहयोगियों की झोली में गई थी। अगले साल होने वाले संसदीय चुनावों में योगी सरकार का कामकाज, अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और गैर भाजपाई-गैर कांग्रेसी राजनीतिक समीकरण अहम भूमिका निभा सकता है। वैसे अगले महीने होने वाले फुलपुर और गोरखपुर संसदीय उप चुनाव में 2019 की झलक दिखाई दे सकती है। इन दोनों सीटों पर भाजपा की जीत हुई थी।

Post a Comment