पूनम पुरोहित मंथन न्यूज़ शिवपुरी - मध्यप्रदेश के ग्वालियर-चंबल अंचल की कोलारस और मुंगावली विधानसभा सीटों पर हो रहे उपचुनाव महज चुनाव नहीं रह गए हैं। ये अब सूबे के दो बड़े नेताओं की नाक का सवाल बन चुके हैं। यूं तो ये दो उपचुनाव जीतने से न तो कांग्रेस की सरकार बन जाएगी और न भाजपा की सरकार के सामने विश्वास का संकट खड़ा होगा। बावजूद इसके एक-एक मतदाता के लिए जिस तरह की घेराबंदी की जा रही है, उससे नौ महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव की गंभीरता को महसूस किया जा सकता है।
कोलारस और मुंगावली विधानसभा सीट कांग्रेस के बड़े नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के संसदीय क्षेत्र में आती है। सिंधिया 2002 से यहां के सांसद हैं, लिहाजा दोनों सीटों पर उनके गहरे असर को नकारा नहीं जा सकता। दूसरी तरफ हैं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, जो उपचुनाव जीतने के मास्टर माने जाते हैं। चौहान के खाते में सर्वाधिक उपचुनाव जीतने का रिकॉर्ड दर्ज है।हालांकि पिछले साल-डेढ़ साल के भीतर चित्रकूट और अटेर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की हार से मुख्यमंत्री की इस छवि को ठेस पहुंची है, इसीलिए मुंगावली और कोलारस में वे कोई जोखिम उठाना नहीं चाहते।
कोलारस और मुंगावली विधानसभा सीट कांग्रेस के बड़े नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के संसदीय क्षेत्र में आती है। सिंधिया 2002 से यहां के सांसद हैं, लिहाजा दोनों सीटों पर उनके गहरे असर को नकारा नहीं जा सकता। दूसरी तरफ हैं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, जो उपचुनाव जीतने के मास्टर माने जाते हैं। चौहान के खाते में सर्वाधिक उपचुनाव जीतने का रिकॉर्ड दर्ज है।हालांकि पिछले साल-डेढ़ साल के भीतर चित्रकूट और अटेर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा की हार से मुख्यमंत्री की इस छवि को ठेस पहुंची है, इसीलिए मुंगावली और कोलारस में वे कोई जोखिम उठाना नहीं चाहते।
भाजपा सरकार के तीसरे कार्यकाल के ये अंतिम उपचुनाव हैं। इसके बाद दोनों दल नवम्बर 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव के मैदान में ही गुत्थमगुत्था होंगे। इस लिहाज से इन चुनावों को सत्ता का सेमीफाइनल माना जा सकता है। सेमीफाइनल का नतीजा फाइनल के नतीजों को काफी हद तक प्रभावित करता है, इसलिए भी दोनों सियासी दलों ने मतदाताओं को अपने पक्ष में खींचने के लिए माइक्रो लेबल तक जमावट की है। विकास के नारों और दावों के बीच जातिगत समीकरणों को अपने पक्ष में करने के लिए ऐसे नेताओं को ढूंढ-ढूंढ कर चुनाव मैदान में झोंका जा रहा है, जिसकी जाति और समाज के वोटर की जानकारी स्थानीय इकाई द्वारा दी जाती है।
भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री के अलावा मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया, नरोत्तम मिश्रा, सांसद प्रभात झा पर ज्यादा भार है। हाल ही में राजस्थान में हुए तीन उपचुनाव के नकारात्मक परिणामों के प्रकाश में मध्यप्रदेश की भाजपा कतई नहीं चाहेगी कि राष्ट्रीय स्तर पर कोई ऐसा संदेश जाए जिसमें वह सूबे में कमजोर नजर आए। कांग्रेस में पूरा दारोमदार सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया पर है। बाकी के नेता 'इलेक्शन टूरिज्म' पर आ-जा रहे हैं। सिंधिया के लिए दोनों सीटें जीतना इसलिए जरूरी है क्योंकि एक तो उनके चुनाव क्षेत्र का मामला है और दूसरा मध्यप्रदेश में अब तक यह तय नहीं हो पाया कि अगला चुनाव सिंधिया की अगुवाई में होगा या किसी और नेता की। इन चुनावों में मिली सफलता के आधार पर पार्टी नेतृत्व भी यह सोचने को मजबूर होगा कि कांग्रेस के राज्य स्तरीय नेताओं में से किस में कितना है दम।

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