MP में नया साल सिंधिया को चुनौती सीएम मंत्री-विधायक व संगठन के पदाधिकारियों की टीम सक्रिय

shivraj nandkumar 31 12 2017पूनम पुरोहित मंथन न्यूज़  भोपाल -साल 2018 मप्र के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण होगा। मप्र की जनता साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव में नई सरकार चुनेगी। इसके लिए सरकार, भाजपा और कांग्रेस पूरे साल अपने आप को झोंक देंगे। इस साल चौंकाने वाले राजनीतिक घटनाक्रम घटने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। सरकार नए मुख्य सचिव की नियुक्ति के साथ-साथ चुनाव के लिए प्रशासनिक अधिकारियों की जमावट और लोगों को ज्यादा से ज्यादा राहत देने पर फोकस करेगी।
सरकार की बदलेगी शक्ल, होगा विस्तार
नए साल के शुरुआती सप्ताह में शिवराज मंत्रिमंडल की शक्ल बदल सकती है। हालांकि यह काम दिसंबर के अंतिम सप्ताह में ही हो जाना था, लेकिन दिल्ली से हरी-झंडी नहीं मिल पाने से इसे कुछ समय के लिए आगे बढ़ाना पड़ा। सूत्रों के मुताबिक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी तरफ से विस्तार की तैयारी कर रखी है।
पिछले रविवार को वे दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, केन्द्रीय मंत्री सुषमा स्वराज, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, पार्टी के प्रदेश प्रभारी विनय सहस्त्रबुद्धे से मुलाकात कर चुके हैं। पहले 28 दिसंबर की तिथि तय हुई थी, जिसे आगे बढ़ा दिया गया। सूत्र बताते हैं कि चुनावी साल में पार्टी नेतृत्व चाहता है कि एक-एक कदम ठोक-बजाकर चला जाए। इसलिए मंत्रिमंडल विस्तार काफी सोच-समझकर किया जा रहा है। पता चला है कि मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी इस बारे में बात कर ली है। सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो विस्तार जनवरी के पहले सप्ताह में हो जाएगा।
चुनावी रंग में रहेगी सरकार
नए साल में सरकार पूरी तरह से चुनाव रंग में रंगी रहेगी। नई योजना व कार्यक्रम घोषित होंगे तो समीक्षाओं का दौर भी तेजी से चलेगा। राजस्व विभाग जमीन के पट्टे युद्ध स्तर पर बांटेगा। समाधान एक दिन योजना की शुरुआत 14 जनवरी से होगी। बड़े वोट बैंक को देखते हुए रबी फसलों में भी भावांतर योजना तो डिफॉल्टर किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज योजना के दायरे में लाने समाधान योजना भी लागू होगी।
नाराज कर्मचारियों को मनाने के लिए सरकार बड़े निर्णय ले सकती है। सूखे की समस्या से निपटना, पेयजल व्यवस्था बनाना, स्मार्ट सिटी व मेट्रो रेल परियोजना को पटरी पर लाने के साथ बजट प्रबंधन बड़ी चुनौती रहेगी। चुनावी साल होने से बजट में लोकलुभावनी घोषणाएं हो सकती हैं।
प्रशासनिक स्तर पर होगा भारी उलटफेर
चुनावी साल के मद्देनजर प्रशासनिक दृष्टिकोण से बड़े बदलाव होंगे। नए मुख्य सचिव नियुक्त होंगे तो कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की सेवाएं केंद्र को सौंपी जा सकती हैं। 10 नए प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी मिलने के बाद मंत्रालय में जिम्मेदारियां नए सिरे से तय होंगी।
वहीं, भोपाल में डीआईजी सहित कई महत्वपूर्ण पदों पर पदस्थापनाएं होंगी। कुछ कलेक्टर और पुलिस अधीक्षकों की छुट्टी हो सकती है। तीन साल से ज्यादा एक स्थान पर जमे अधिकारियों की चुनाव आयोग के निर्देश पर बदली भी होगी। चुनावी साल के दृष्टिगत तबादला नीति जारी करने से सरकार पीछे हट सकती है। पदोन्नति में आरक्षण के मुद्दे का तोड़ निकालने के लिए नए नियम भी लागू किए जा सकते हैं।
चुनौतियों से पार पाना होगा कांग्रेस
वर्ष 2018 में कांग्रेस को संगठन से लेकर जमीन तक पर कई चुनौतियों का सामना करना है। संगठन में प्रदेश कांग्रेस में छाई अनिश्चितता की स्थिति को आम कार्यकर्ता के दिलो-दिमाग से दूर करना है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हो या विधानसभा चुनाव में चेहरा घोषित करने या गुजरात तर्ज पर अलग-अलग क्षेत्रों की जिम्मेदारी दिग्गजों को दिए जाने के लिए तैयार करना भी नेतृत्व के सामने बड़ा काम है।
अभा कांग्रेस के महासचिव व प्रदेश प्रभारी दीपक बाबरिया को संगठन में ब्लॉक से लेकर प्रदेश कांग्रेस कमेटी की कार्यकारिणी तक को नया रूप देना है। विधानसभा चुनाव में वही टीम काम करेगी तो जितना जल्दी हो, उसे बनाना आज की जरूरत है।
उपचुनाव-नगरीय निकाय चुनावों में परीक्षा
प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2018 के पहले मुंगावली और कोलारस विधानसभा सीटों के उपचुनाव होना हैं तो जनवरी में नगरीय निकाय चुनाव होने जा रहे हैं। 15वीं विधानसभा के लिए होने वाले चुनाव के पहले विधानसभा उपचुनाव व नगरीय निकाय चुनाव भाजपा और कांग्रेस के लिए सेमीफाइनल हैं।
इन क्षेत्रों में कांग्रेस सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया का खासा प्रभाव है, लेकिन सीएम से लेकर कई मंत्री-विधायक व संगठन के पदाधिकारियों की टीम के सक्रिय होने से सिंधिया के लिए भी चुनौती खड़ी हो गई है। वहीं धार, बड़वानी, खंडवा, गुना, शिवपुरी व अनूपपुर में नगरीय निकाय चुनाव भी भाजपा व कांग्रेस के लिए विधानसभा चुनाव 2018 का ट्रायल रन साबित होंगे।
कार्यकर्ताओं को साधते हुए सत्ता बरकरार रखने की चुनौती
भारतीय जनता पार्टी के लिए साल 2018 की सबसे बड़ी चुनौती विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करना है। पिछले कुछ सालों में भाजपा के लिए कार्यकर्ताओं की नाराजगी सबसे बड़ी मुसीबत बनकर उभरी है। ऐसे में विधानसभा उपचुनावों में इस नाराजगी को दूर करते हुए सत्ता को बरकरार रखने की बड़ी चुनौती होगी।
यह देखना दिलचस्प होगा कि अमित शाह की घोषणा के मुताबिक मौजूदा नेतृत्व ही चुनाव की कमान संभालेगा या किसी बहाने मप्र से ताल्लुक रखने वाले केंद्रीय स्तर के नेताओं को चुनावी नैया पार लगाने के लिए मप्र भेजा जाएगा। इसके अलावा आने वाले दिनों में कोलारस और मुंगावली विधानसभा उपचुनावों में भी पार्टी का लिटमस टेस्ट होना है।