पूनम पुरोहित मंथन न्यूज़ दिल्ली 2fed 2018 -प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 69वें गणतंत्र दिवस से ठीक पहले ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की बात छेड़कर एक राष्ट्रीय बहस की शुरुआत की है. यह भारतीय संविधान और लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण बहस है, जिसके बहुत गहरे असर हो सकते हैं और इसलिए यह बहुत जरूरी है कि देश का हर सचेत नागरिक इस बहस में शामिल हो. इस बहस में हिस्सा लेने से पहले आवश्यक है कि इस प्रस्ताव के पक्ष और विपक्ष के तर्कों को जान लिया जाए, ताकि किसी सुसंगत निष्कर्ष तक पहुंचना संभव हो. मुमकिन है कि इस आलेख में तमाम तर्कों को शामिल करना संभव न हो, इसलिए इस आलेख को पूरी बहस में एक हस्तक्षेप के तौर पर ही देखा जाए.
भारत ही नहीं, दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में चुनाव का निर्णायक महत्व है. भारत ने 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को स्वीकार किया है, इसका मतलब है कि भारत के हर मतदाता को चुनाव में एक वोट देने का अधिकार है और हर मतदाता के वोट का मूल्य समान है. ज्यादातर भारतीय नागरिक को कम से कम दो स्तरों पर वोट देने का अधिकार है. भारतीय संविधान ने संघीय ढांचे का प्रावधान किया है, उसके तहत मतदाता लोकसभा और विधानसभा के लिए मतदान कर सकता है.
घीय ढांचे का मतलब यह है कि विधानसभाएं, लोकसभा के अधीन नहीं हैं, बल्कि उनका स्वतंत्र अस्तित्व है और उनके बीच कार्य विभाजन के लिए सूचियां बनी हुई हैं. दिल्ली और पुदुचेरी के अलावा बाकी केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव नहीं होते. वयस्क नागरिकों को स्थानीय निकायों के लिए होने वाले चुनावों में भी मतदान का अधिकार है.
'वन नेशन, वन इलेक्शन' की मौजूदा बहस में, लोकसभा और देश की तमाम विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की बात है ताकि देश में पांच साल में एक ही बार में सारे चुनाव हो जाएं.
इस प्रस्ताव के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह है कि एक साथ सारे चुनाव करा लेने से बार-बार होने वाले चुनाव का खर्च बचेगा. भारत में चुनाव को एक खर्चीला कार्य माना जाता है. हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव के बारे में चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि इस चुनाव में प्रति मतदाता 17 रुपए का खर्च आया था. 2009 के लोकसभा चुनाव में यह खर्च 12 रुपए प्रति मतदाता था. क्या यह बहुत बड़ी रकम है? इसका जवाब अलग-अलग हो सकता है.
चुनाव का सरकारी खर्च बढ़ने की सबसे बड़ी वजह कैंडिडेट्स की संख्या में बढ़ेतरी है. इसके अलावा मतदाताओं में जागृति फैलाने के विज्ञापनों, वोटर स्लिप के बंटवारे और अब वोटिंग मशीन के साथ कागज की पर्ची निकालने की मशीन को जोड़ने पर भी खर्च आ रहा है. लेकिन आम तौर पर पांच साल में होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह खर्च इतना भी नहीं है कि इसे फिजूलखर्ची माना जाए.
घीय ढांचे का मतलब यह है कि विधानसभाएं, लोकसभा के अधीन नहीं हैं, बल्कि उनका स्वतंत्र अस्तित्व है और उनके बीच कार्य विभाजन के लिए सूचियां बनी हुई हैं. दिल्ली और पुदुचेरी के अलावा बाकी केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव नहीं होते. वयस्क नागरिकों को स्थानीय निकायों के लिए होने वाले चुनावों में भी मतदान का अधिकार है.
'वन नेशन, वन इलेक्शन' की मौजूदा बहस में, लोकसभा और देश की तमाम विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की बात है ताकि देश में पांच साल में एक ही बार में सारे चुनाव हो जाएं.
इस प्रस्ताव के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यह है कि एक साथ सारे चुनाव करा लेने से बार-बार होने वाले चुनाव का खर्च बचेगा. भारत में चुनाव को एक खर्चीला कार्य माना जाता है. हालांकि 2014 के लोकसभा चुनाव के बारे में चुनाव आयोग के आंकड़ों से पता चलता है कि इस चुनाव में प्रति मतदाता 17 रुपए का खर्च आया था. 2009 के लोकसभा चुनाव में यह खर्च 12 रुपए प्रति मतदाता था. क्या यह बहुत बड़ी रकम है? इसका जवाब अलग-अलग हो सकता है.
चुनाव का सरकारी खर्च बढ़ने की सबसे बड़ी वजह कैंडिडेट्स की संख्या में बढ़ेतरी है. इसके अलावा मतदाताओं में जागृति फैलाने के विज्ञापनों, वोटर स्लिप के बंटवारे और अब वोटिंग मशीन के साथ कागज की पर्ची निकालने की मशीन को जोड़ने पर भी खर्च आ रहा है. लेकिन आम तौर पर पांच साल में होने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों को देखते हुए यह खर्च इतना भी नहीं है कि इसे फिजूलखर्ची माना जाए.

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