शिवराज के लिए खतरे की घंटी है नगर निकाय के नतीजे?

शिवराज के लिए खतरे की घंटी है नगर निकाय के नतीजे?पूनम पुरोहित मंथन न्यूज़ भोपाल -मध्य प्रदेश में 20 नगर निकायों के चुनाव नतीजे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए खतरे का संकेत देने वाले हैं. नगर निकायों के 20 अध्यक्षों के चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस दोनों को ही 9-9 सीटों पर जीत मिली है. एक सीट पर बीजेपी की बागी उम्मीदवार चुनाव जीतने में सफल रहीं हैं. जबकि एक स्थान सेमरिया के वोटों की गिनती कोर्ट द्वारा लगाई रोक के कारण नहीं हुई है.

बीजेपी के एक उम्मीदवार र्निविरोध निर्वाचित होने में सफल रहे थे. जिन नगर निकायों में चुनाव हुए हैं, उनमें ज्यादतर आदिवासी बहु इलाके हैं. दिलचस्प यह है कि इन चुनावों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जमकर प्रचार किया था, लेकिन कांग्रेस के दिग्गज नेता कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कोई दिलचस्पी किसी स्तर पर नहीं दिखाई थी.

दिग्विजय सिंह के गृह नगर राघोगढ़ में सेंध लगाने की मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की कोशिश भी सफल नहीं हो पाई. दिग्विजय सिंह इन दिनों नर्मदा परिक्रमा कर रहे हैं. इस कारण बीजेपी को उम्मीद थी कि वह राघोगढ़ के किले को भेदने में कामयाब रहेगी. चुनाव प्रचार के दौरान यहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की सभा के बाद कांग्रेस और बीजेपी के कार्यकर्त्ताओं के बीच विवाद हुआ. प्रशासन को धारा 144 लगाना पड़ी थी. इन चुनावों में बीजेपी और कांग्रेस दोनों को ही अध्यक्ष के पद के लिए 43-43 फीसदी वोट मिले हैं.
बीजेपी के चुनाव जीतने वाले पार्षदों की संख्या भी ज्यादा है. इस कारण बीजेपी 46 फीसदी वोट हासिल करने में सफल रही है. जबकि कांग्रेस के पार्षद उम्मीदवारों को कुल 42 फीसदी वोट मिले हैं. इन 20 स्थानों पर पार्षदों के कुल 356 पदों का चुनाव हुआ. बीजेपी के 194 और कांग्रेस के 145 पार्षद उम्मीदवारों चुनाव जीते हैं. 13 निर्दलीय पार्षद चुने गए हैं.
क्या कांग्रेस में लौट रहे हैं दलित-आदिवासी?
मध्य प्रदेश में इस साल के अंत तक विधानसभा के चुनाव होने हैं. राज्य की कुल 230 सीटों में 47 सीटें आदिवासी और 35 सीटें दलित वर्ग के लिए आरक्षित हैं. वर्ष 2013 में हुए विधानसभा चुनाव के ठीक पहले बीजेपी द्वारा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के कारण कांग्रेस को अपनी परंपरागत सीटों से हाथ धोना पड़ा था. पहली बार बीजेपी को निमाड़-मालवा और महाकौशल के आदिवासी क्षेत्रों में एतिहासिक सफलता हासिल हुई थी.

पिछले कुछ समय से दलित-आदिवासी बीजेपी से नाराज चल रहे हैं. इसकी वजह पार्टी की आरक्षण को लेकर नीति मानी जा रही है. राज्य में दलित और आदिवासी वोटों को साधने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने कई नई योजनाएं भी लागू की हैं. राष्ट्रीय स्वयं सेवक (आरएसएस) संघ भी दलित और आदिवासी वोटों को साधने के लिए एक श्मशान, एक जलाशय और एक देवालय योजना पर तेजी से काम कर रहा है.